ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे मित्रों के पूजनीय अग्नि! तुम उज्ज्वल तेज से युक्त होकर देवों के साथ यज्ञ के कुशों
पर बैठते हो. (१४)
यो अग्निं तन्वो३ दमे देवं मर्तः सपर्यति. तस्मा इद्दीदयद्वसु.. (१५)
जो मनुष्य धनप्राप्ति के लिए अपने घर में अग्नि की सेवा करता है, अग्नि उसीको धन
देते हैं. (१५)
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपां रेतांसि जिन्वति.. (१६)
देवों के मस्तक, द्युलोक के कूबड़ और धरती के पति अग्नि जल के प्राणियों को प्रसन्न
करते हैं. (१६)
उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते. तव ज्योतींष्यर्चयः.. (१७)
हे अग्नि! तुम्हारी निर्मल, शुक्लवर्ण और दीप्ति वाली किरणें तुम्हारे तेज को प्रेरित
करती हैं. (१७)
ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वर्पतिः. स्तोता सयां तव शर्मणि.. (१८)
हे स्वर्ग के पति अग्नि! तुम वरणीय एवं देने योग्य धन के स्वामी हो. मैं सुख के निमित्त
तुम्हारा स्तोता बनूं. (१८)
त्वामग्ने मनीषिणस्त्वां हिन्वन्ति चित्तिभिः. त्वां वर्धन्तु नो गिरः.. (१९)
हे अग्नि! मनीषी लोग तुम्हारी स्तुति करते हुए यज्ञकर्मों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं.
हमारी स्तुतियां तुम्हें बढ़ावें. (१९)
अदब्धस्य स्वधावतो दूतस्य रेभतः सदा. अग्नेः सख्यं वृणीमहे.. (२०)
हम हिंसारहित, शक्तिशाली, देवों के दूत एवं देवों की स्तुति करने वाले अग्नि की मित्रता
चाहते हैं. (२०)
अग्निः शुचिव्रततमः शुचिर्विप्रः शुचिः कविः. शुची रोचत आहुतः.. (२१)
अतिशय शुद्ध कर्मों वाले, शुद्ध मेधावी, पवित्र व यज्ञकार्य समाप्त करने वाले अग्नि
बुलाने पर सुशोभित होते हैं. (२१)
उत त्वा धीतयो मम गिरो वर्धन्तु विश्वहा. अग्ने सख्यस्य बोधि नः.. (२२)
हे अग्नि! मेरी स्तुतियां एवं यज्ञकर्म तुम्हें सदा बढ़ावें. तुम हमारी मित्रता को सदा जानो.
(२२)
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