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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1242 of 1855

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Page 1242

आभिर्विधेमाग्नये ज्येष्ठाभिर्व्यश्ववत्. मंहिष्ठाभिर्मतिभिः शुक्रशोचिषे.. (२३)
हम व्यश्व ऋषि के समान ही उज्ज्वल तेज वाले अग्नि की सेवा अत्यंत प्रशंसायोग्य एवं
पूज्यतम स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२३)
नूनमर्च विहायसे स्तोमेभिः स्थूरयूपवत्. ऋषे वैयश्व दम्यायाग्नये.. (२४)
हे व्यश्व के पुत्र ऋषि विश्वमना! तुम स्थूलयूप नामक ऋषि के समान ही महान् एवं
यजमान के घर में उत्पन्न अग्नि की पूजा स्तोत्रों द्वारा करो. (२४)
अतिथिं मानुषाणां सूनुं वनस्पतीनाम्. विप्रा अग्निमवसे प्रत्नमीळते.. (२५)
मेधावी यजमान रक्षा के लिए मनुष्यों के अतिथि, वनस्पतियों के पुत्र तथा प्राचीन अग्नि
की स्तुति करते हैं. (२५)
महो विश्वाँ अभिषतोऽभि हव्यानि मानुषा. अग्ने नि षत्सि नमसाधि बर्हिषि.. (२६)
हे स्तुति योग्य अग्नि! सभी महान् स्तोताओं के सामने तुम कुशों पर बैठो एवं मानवों
का हव्य स्वीकार करो. (२६)
वंस्वा नो वार्या पुरु वंस्व रायः पुरुस्पृहः. सुवीर्यस्य प्रजावतो यशस्वतः.. (२७)
हे अग्नि! हमें गौ आदि वरणीय संपत्ति तथा बहुतों द्वारा इच्छित धन दो जो शोभन
शक्ति वाले पुत्र-पौत्रों से युक्त एवं कीर्ति वाला हो. (२७)
त्वं वरो सुषाम्णेऽग्ने जनाय चोदय. सदा वसो रातिं यविष्ठ शश्वते.. (२८)
हे वरणीय, निवासस्थान देने वाले एवं अतिशय युवा अग्नि! सोम का सुंदर गान करने
वालों के प्रति सदा धन को प्रेरित करो. (२८)
त्वं हि सुप्रतूरसि त्वं नो गोमतीरिषः. महो रायः सातिमग्ने अपा वृधि.. (२९)
हे अग्नि! तुम शोभन दाता हो. हमें पशुओं से युक्त अन्न एवं देने योग्य महान् धन दो.
(२९)
अग्ने त्वं यशा अस्या मित्रावरुणा वह. ऋतावाना सम्राजा पूतदक्षसा.. (३०)
हे अग्नि! तुम यशस्वी हो. तुम यज्ञयुक्त, भली प्रकार दीप्तिशाली एवं युद्ध बल वाले मित्र
व वरुण को इस यज्ञ में ले आओ. (३०)
सूक्त—२४ देवता—इंद्र
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