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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 196 of 286

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Page 196

२०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—धाइ = धात्री । खवासिनि = दहेज में वधू के साथ आने-
वाली लौंडी । अपनी घातैं = अपने स्वार्थ से । माई = हे सखी । तातैं = इस
कारण । नेक = जरा । हरैं हरैं बोलि = धीरे से बोलो । बलाइ ल्यों = बलैया
लेती हूँ । डरपों = डरती हूँ । जातैं = जिससे, इससे । माखन सो = मक्खन
की भाँति ( मृदु ) । कठेठी = कठोर ।
भावार्थ—( नायक ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है, वह नायिका
से कह रही है ) हे सखी, धाय और दासी सब अपनी गाँ से तुझे सकुचती हैं ।
पर मुझे तो कहना ही पड़ता है (कहाँ तक संकोच करूँ)। ब्रह्मा ने मुझे तेरे साथ
बांध दिया है, इसीलिए (नहीं तो मुझे क्या पड़ी थी)। मैं तेरी बलैया लेती हूँ,
थोड़ा धीरे धीरे बोल, मुझे डर लगता है कि मेरे मोहन का मन मक्खन की तरह
मृदु है और तेरी बातें काठ की तरह कठोर हैं—कहीं ये उसमें गड़ न जाएँ ।
अलंकार—धर्मलुप्तोपमा ( माखन सो मेरे मोहन को मन ), पूर्णोपमा
( काठ सी तेरी कठेठी बातें), विषम ( कहाँ मृदु मन कहाँ काठ सी बातें ) ।
श्रीकृष्णजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
( ३७२) काहूँ कह्यो 'हरि रूठि रहे' तब तें बहु बुद्धि बितर्क बढ़ावै ।
सोधि सबै अपनो सो रही धन मीत रहैं सु उपाय न पावै ।
हाँ वह रीति इहाँ यह केसव ज्यों दुहुँ ओर जरे कों जरावै ।
बूझति हौं पिय प्यारी तिहारी सु मान करै कि मनावन आवै ।१३।
शब्दार्थ—सोधि रही = विचार करके थक गई । मीत = (मित्र) प्रिय ।
भावार्थ—( नायिका ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है । वह
नायक से कह रही है ) किसी ने कहीं कह दिया कि श्रीकृष्ण रूठे हुए हैं ।
जब से ऐसा सुना तभी से वह अपनी बुद्धि में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क कर
रही हैं। अपनी वाली सब कुछ कर धरकर वह थक गई । 'धन भी रहे और
मित्र भी न जाय' ऐसा कोई उपाय उसे दिखाई नहीं देता । वह तो यहाँ
दशा है और यहाँ यह कि आप मान किए बैठे हैं आप भी उसे कष्ट दे रहे हैं
(औरों ने वह कथा सुनाकर कष्ट दिया ) । उस बेचारी की तो वही दशा है
कि दोनो ओर से जल रही है ( उसे इस स्थिति से निकालनेवाला कौन है) ।
इससे मैं आप ही से पूछती हूँ कि वह ऐसी हालत में स्वयम् मान करे या आप
को मनाने के लिए यहाँ दौड़ी आए ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
१३—बहु-यह । रहै-मिलै । सु-सो । ज्यों-जौ । कों-को । जरावै-
जुड़ावै । बूझति-पूछति ।