रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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यह परिरंभन कहावै कौन केसोदास,
मेरी सौं जौ मोसों तुम राखहु दुराइकै ।
राधिका की अधिकाई कहा कहौं लीनो आजु,
आपनो पियारो पीउ आपुहीं मनाइकै ॥१०॥
शब्दार्थ—गाथा = प्राकृत भाषा का मात्रिक छंद । भाउ = भाव,
तात्पर्य । रदन थल = दंताघात का स्थान । करज = नख । करज थल = नख-
क्षत का स्थान । परिरंभन = आलिंगन । अधिकाई = विशेषता ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण के मान करने की बात सुन-
कर राधिका हँसती हँसती आईं और आकर श्रीकृष्ण को एक गाथा सुनाई। सुना-
कर उन्होंने पूछा कि 'इसका तात्पर्य तो मुझको समझा दीजिए । (इसमें दंपति
के एक साथ ही अधरपान की जो बात कही गई है वह) कैसे संभव है कि प्रिय
और प्रेमिका परस्पर एक दूसरे का अधर-मधु-पान करें (दंत एवम् नखक्षत की
बात जो कही गई है वह) दंतक्षत एवम् नखक्षत करने का स्थान कौन सा है ?
इस प्रकार (स्वयम् आलिंगन करती हुई) आलिंगन करने की बात जो इसमें
कही गई है वह कौन सा आलिंगन कहलाता है ? तुम्हें मेरी शपथ अगर
मुझसे कोई बात छिपा रखो ।' राधिका की विशेषता तो देख, उसने स्वयम् ही
आज अपने प्यारे पति को मना लिया (हम लोगों की आवश्यकता ही न पड़ी) ।
सूचना—'यह परिरंभन कहावै कौन' कहती हुई नायिका ने आलिंगन-
दान किया है । यही दान उपाय है ।
अलंकार—पर्यायोक्ति ( छल से कार्यसिद्धि ) ।
अथ भेद-लक्षण—( दोहा )
(३७०) सुख दै कै सब सखिनि कहँ, आपु लेइ अपनाइ ।
तब सु छुड़ावै मान कों, बरनौ भेद बनाइ ॥११॥
भावार्थ—जहां सखियों को अपनी ओर मिला लिया जाय और वे ही
मान'छुड़ाएँ, वहाँ भेद उपाय होता है ।
श्रीराधिकाजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
(३७१) केसव धाइ खवासिनि तोहि सखी सकुचैं सब आपनी घातैं ।
मोहिं तौ माई कहेहीं बनै अब बाँधि दई बिधि तो कहँ तातैं ।
नेक हरें हरें बोलि बताइ ल्यौं हौं डरपौं गड़ि जाइ न जातैं ।
माखन सो मेरे मोहन को मन काठ सी तेरी कठेठो ये बातैं ॥१२॥
१०—गाथा-गाहा । कहहु-कहो धौं । एक हों-पु एकै । रदन०-उरज
करज । दीजहि-दीजै जू । केसोदास-केसोराय । राखहु-राखि हौ । ११—
सु छुड़ावै०-जु मनावै मानिनिहि । छुड़ावै-छिड़ावै । बनाइ-सुनाइ । १२—
तो-ती । जातैं-पातैं ।