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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 191 of 286

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Page 191

दशम प्रभाव १६५
सूचना—यहां भी प्रकरण पिछले छंद की ही भाँति है। सखी बहिरंग
है अतः 'प्रकाश' मान है।
(दोहा)
(३५६) राधा राधा-रमन के, बरने मान समान ।
तिनको मान मनाइबो, कहियत सुनौ सुजान ।२१।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभशृंगार
मानवर्णनं नाम नवमः प्रभावः । ९।
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दशम प्रभाव
अथ मानमोचन-लक्षण—(दोहा)
(३६०) मान तजहिं प्रीतम प्रिया, कहि केसव करि प्रीति ।
बरनि सुनाऊँ सुनहु सब, मैं जु सुनी षट रीति ।१।
भावार्थ—नायक और नायिका प्रेमपूर्वक मिलकर मान त्याग देते हैं ।
इसके छह प्रकार हैं।
(३६१) साम दान भनि भेद पुनि, प्रनति उपेच्छा मानि ।
पुनि प्रसंगबिध्वंस अरु, दंड होइ रस-हानि ।२।
भावार्थ—वे छह प्रकार ये हैं—साम, दान, भेद, प्रणति, उपेक्षा और
प्रसंगविध्वंस । दंड में रस नहीं रह जाता इसलिए वह वर्जित है।
अथ साम-लक्षण—(दोहा)
(३६२) ज्यों क्योंहूँ मन मोहियै, छूटि जाइ जहँ मान ।
सोई साम उपाय कहि, केसवदास बखान ।३।
शब्दार्थ—ज्यों० = जिस किसी प्रकार से ।
श्रीराधिकाजू को साम उपाय, यथा—(सवैया)
(३६३) केसवदास सदा कियै आस रहै सुख की दुख ताहि न दीजै ।
ताहू सों रोष न मानियै मानिनि भूलिहुँ आपनो मानि सु लीजै।
हौँ तुम्हीं तुम हौँ सुनि सुंदरि मूरति द्वै जिय एकहीं जीजै ।
मान है भेद को मूल महा अपने सहुँ सो सपनेहुँ न कीजै । ४।
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२१—बरने मान समान-कहे जथामति मान । सुनौ-सुनहु ।
१-तजहि-तजें । सुनहु०-सो सबै । २-दान०-दामअरु । पुनि-अरु, औरु।
अरु-पुनि। होइ-होहि । ३—क्योंहूँ-त्यों करि । छूटि-मूलि । कहि-कबि ।
४—ताहू-केहूँ । भूलिहुँ-भुलि सु । सु-जु । हौँ तुम्हीं०-वै तुम ही तुम वै ।
अपने०-अपनेहुँन सों । सपनेहुँ न-सपने नहिं ।