रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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साथ भिगो दिया जाय तो वे काले पड़ जायँ और उस पर हींग का लेप कर दिया
जाय तो उसमें हींग की गन्ध न रहे तो इस लोह को कान्तलौह समझना चाहिये।
१ भ्रामक, २ चुम्बक, ३ कर्षक, ४ द्रावक, ५ रोमक, ये कान्तलोह के पाँच
भेद माने जाते हैं।
जिस लोह के मुख में किसी धातु को डालने पर वह धातु लोह के चारों
तरफ चक्रवत् घूमता रहे तो उसे निःसन्देह भ्रामक कान्तलोह कहा जाता है
और जिस लोह पर किसी धातु को लगा ( छुवा ) देने से यह लोह उस धातु
को अपनी तरफ खींचता और छोड़ता जाय तो उसे चुम्बक कान्तलोह कहा
जाता है। जो लौह धातु को दूर से अपनी ओर खींचकर अपने में चिपका ले
और न छोड़े तो उसे कर्षक कान्तलोह कहा जाता है। जिस लौह के योग से
स्वर्ण आदि पिघल जायँ तो उसे द्रावक कान्तलोह कहते हैं। और जिस लौह
को अग्नि में तपाने पर लोह के फटने से चमकीले बाल जैसे रेशे निकल आयें
या दिखायी दें तो इसे रोमक कान्त लौह कहते हैं।
कान्तलोह के भेदों को ठीक-ठीक निर्णय कर अन्वेषण करने के लिये
रसरत्न समुच्चय, आयुर्वेदप्रकाश आदि प्राचीन ग्रन्थों का अच्छी तरह अध्ययन
करना चाहिए जिससे दुर्लभ द्रव्य की प्राप्ति से आयुर्वेदजगत् में विज्ञान की
पक्की मोहर लगा सकें।
उक्त पञ्चविध कान्तलोहभेदों में से भ्रामक संज्ञक कान्तलोह अधम, चुम्बक
कान्तलौह मध्यम, कर्षककान्तलौह उत्तम और द्रावक कान्तलौह इन सब से
उत्तम माना जाता है।
यहाँ पर रोमककान्तलौह का वर्णन न करने से इसे भी उत्तम गुणयुक्त
माना जायगा।
कान्तलोह पीतवर्ण, कृष्णवर्ण तथा रक्तवर्ण का इस तरह वर्णभेद से तीन
प्रकार का माना जाता है। इसमें से पीतवर्ण कान्तलोह का ब्रह्मा देवता, कृष्ण-
वर्ण का विष्णु देवता और रक्तवर्ण कान्तलौह का शिव देवता माना जाता है। इसी
पीतवर्ण से कृष्णवर्ण और कृष्णवर्ण से रक्तवर्ण कान्त उत्तम माना जाता है।
एकमुख कान्तलोह, द्विमुख कान्तलोह, त्रिमुख कान्त, चतुर्मुखकान्त और
पञ्चमुख तथा सर्वतोमुख कान्त, इस प्रकार मुखभेद से द्विमुख से त्रिमुख, त्रिमुख
से चतुर्मुख और चतुर्मुख से पञ्चमुख और पञ्चमुख से भी सर्वतोमुख कान्तलोह
उत्तम माना जाता है।