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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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नवमोऽध्यायः ।
२४९

यस्मिन्निपतति सूतः प्रोक्तं तद्दीपिकायन्त्रम् ॥ १३ ॥

उपर्युक्त विधि से कच्छप यंत्र बनाकर उसमें एक मिट्टी का खर्पर रख कर उसमें एक दीपिका या मूषा अथवा सकोरा रख देना चाहिए, इस सकोरे में पारद भर दें, फिर अग्नि के प्रभाव से पारद उस दीपिका से कच्छप यंत्र में उड़ कर गिर जाता है, इसको दीपिकायंत्र कहते हैं ॥ १३ ॥

अथ ढेकीयन्त्रम्—

भाण्डकण्ठादधश्छिद्रे वेणुनालं विनिक्षिपेत् ।
कांस्यपात्रद्वयं कृत्वा सम्पुटं जलगर्भितम् ॥ १४ ॥
नलिकास्यं तत्र योग्यं दृढं तच्चापि कारयेत् ।
युक्तद्रव्यैर्विनिक्षिप्तः पूर्वं तत्र घटे रसः ॥ १५ ॥
अग्निना तापितो नालात्तोये तस्मिन् पतत्यधः ।
यावदुष्णं भवेत्सर्वं भाजनं तावदेव हि ।
जायते रससन्धानं ढेकीयन्त्रमितीरितम् ॥ १६ ॥

एक मिट्टी के बड़े भाण्ड में या घड़े में कुछ (स्वेदनोपयोगी) औषधियों (क्षार, अम्ल इत्यादि) के साथ घोटे हुए पारद का लेप करके उस भाण्ड को सुखा लेना चाहिए । पश्चात् उस भाण्ड की ग्रीवा से कुछ नीचे (पास ही) एक छिद्र बनाकर उसमें बांस की नली का एक भाग प्रविष्ट कर भाण्ड का मुख तथा छिद्र के आस पास कपड़मिट्टी कर देना चाहिए । फिर दो कांस्य के पात्रों (कटोरों) का परस्पर सन्धिबन्धन करके ऊपर के पात्र में एक छिद्र बनाकर इसमें उस बांस की नली का दूसरा भाग प्रविष्ट करके मजबूती से सन्धिबन्धन कर देना चाहिए, फिर इस भाण्ड को आसानी से चूल्हे पर चढाकर नीचे आग जलादे, अग्नि के ताप से भाण्ड के अन्दर औषधियों के साथ घोटकर लिप्त किया हुआ पारद उड़कर उस बांस की नलिका में होता हुआ कांसे के पात्र के जल में गिर जायगा । सम्पूर्ण भाण्ड के प्रतप्त हो जाने पर प्रायः सब पारा उड़ जाता है, इसको ढेकी यन्त्र कहते हैं ॥ १४-१६ ॥

अथ जारणायन्त्रम्—

लोहमूषाद्वयं कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः ।
ईषच्छिद्रान्वितामेकां तत्र गन्धकसंयुताम् ॥ १७ ॥