रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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रसरत्नसमुच्चये—
ल्टी में जलभर कर कपड़े को चारवार मोड़ कर लत्ते बनाकर जल में भिगो कर ऊपरी भाण्ड के पृष्ठ पर रखो कुछ देर बाद इनको बदलते रहना चाहिए । इसी को पातना यन्त्र कहते हैं ॥ ६-८ ॥
अथ अधःपातनयन्त्रम्—
अथोर्ध्वभाजने लिप्तस्थापितस्य जले सुधीः ।
दीप्तैर्वनोत्पलैः कुर्यादधःपातं प्रयत्नतः ॥ ९ ॥
उपर्युक्त विधि से बने हुए पातन यन्त्र के ऊपर वाले भाण्ड में सन्धि बन्धन करने के पहिले निम्बूरस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप कर सुखा लेना चाहिए फिर सन्धिवन्धन करके ऊपर के भाण्ड में एक थाला या पाली बनाकर जङ्गली उपलों को उस पाली में रखकर जला देने चाहिए । इस तरह अग्निके कारण पारद निकल कर नीचे के जल से भरे भाण्ड में गिर जाता है इसको अधः पातन यन्त्र कहते हैं ॥९॥
अथ कच्छपयन्त्रम्—
जलपूर्णपात्रमध्ये दत्त्वा घटखर्परं सुविस्तीर्णम् ।
तदुपरि बिडमध्यगतः स्थाप्यः सूतः कृतः कोष्ठ्याम् ॥ १० ॥
लघुलोहकटोरिकया कृतषण्मृत्सन्धिलेपयाऽऽच्छाद्य ।
पूर्वोक्तघटखर्परमध्येऽङ्गारैः खदिरकोद्भवैः ॥ ११ ॥
स्वेदनतो मर्दनतः कच्छपयन्त्रस्थितो रसो जरति ।
अग्निबलेनैव ततो गर्भे द्रवन्ति सर्वसत्त्वानि ॥ १२ ॥
एक जल से भरे हुए पात्र ( नाद ) के मध्य भाग में बड़ा कूंड़ा या घट का गहरा कपाल रख कर उसमें मूषायंत्र को पारे से भर कर रख देना चाहिए। फिर मूषा के ऊपर एक छोटी लोहे की कटोरी ढक कर उसके चारों ओर ६ वार कपड़मिट्टी कर देनी चाहिये । फिर उस घटखर्पर ( कूण्ड या कपाल के खाली भाग में ) में खदिर या बैर ( बदरी काष्ठ ) की लकड़ी के कोयले भर कर अग्नि जला दें, इस तरह स्वेदन और मर्दन दोनों संस्कार होकर इस यन्त्र में रखे हुए पारद का जारण हो जाता है, इसी यन्त्र से अन्य धातुओं का सत्त्वपातन भी करते हैं । इसको कच्छपयन्त्र कहते हैं ॥ १०-१२ ॥
अथ दीपिकायन्त्रम्—
कच्छपयन्त्रान्तर्गतमृण्मयपीठस्थदीपिकासंस्थः ।