रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२५० रसरत्नसमुच्चये—
मूषायां रसयुक्तायामन्यस्यां तां प्रवेशयेत् ।
तोयं स्यात्सूतकस्याध ऊर्ध्वाधो वह्निदीपनम् ॥ १८ ॥
१२ अङ्गुल लम्बी दो लोहे की मूषा बना कर एक मूषा में कुछ छिद्र बनवा कर उस में गन्धक भर दें, फिर इस गन्धक युक्त मूषा को पारद से भरी हुई द्वितीय मूषा के अन्दर रख देवे ( पारद जिसमें भरना हो उसको कुछ बड़ी बनवाना चाहिए ) पश्चात् इन दोनों मूषा को एक जल से भरे हुए भाण्ड में रख कर उस भाण्ड को चूल्हे पर चढाकर अग्नि जला देना चाहिए । इसको जारणा यंत्र कहते हैं ॥ १७-१८ ॥
अथ जारणायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—
रसोनकरसं भद्रे यत्नतो वस्त्रगालितम् ।
दापयेत्प्रचुरं यत्नादाप्लाव्य रसगन्धकौ ॥ १९ ॥
स्थालीकायां पिधायोर्ध्वं स्थालीमन्यां दृढां कुरु ।
सन्धिं विलेपयेद्यत्नान्मृदा वस्त्रेण चैव हि ॥ २० ॥
स्थाल्यन्तरे कपोताख्यं पुटं कर्षाग्निना सदा ।
यन्त्रस्याधः करीषाग्निं दद्यात्तीव्राग्निमेव वा ॥ २१ ॥
एवं तु त्रिदिनं कुर्यात्ततो यन्त्रं विमोचयेत् ।
तप्तोदके तप्तचुल्ल्यां न कुर्याच्छीतलां क्रियाम् ॥ २२ ॥
न तत्र क्षीयते सूतो न च गच्छति कुत्रचित् ।
अनेन च क्रमेणैव कुर्याद्गन्धकजारणम् ॥ २३ ॥
हे पार्वति ! एक स्थाली के अन्दर पारद और गन्धक दोनों भर कर वस्त्र से छाने हुए लहसुन के पानी (स्वरस) से उन दोनों को खूब भिगोना ( आप्लावित करना) चाहिए । फिर एक शराव से रस तथा गन्धक को बन्द करके ऊपर एक और स्थाली ढककर दोनों स्थालियों की वस्त्र तथा कपड़मिट्टि से सन्धि अच्छी तरह बन्दकर के यंत्र के नीचे तेज आंच दें तथा यंत्र के ऊपर की स्थाली के ऊपर भी उपलों की आंच से कपोत (१)पुट देना चाहिए, इस तरह तीन दिन
( १ ) कपोतपुटलक्षणम्—
यत्पुटं दीयते खाते अष्टसङ्ख्यैर्वनोपलैः ।
कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ॥ १ ॥