रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२३६ रसत्नसमुच्चये—
किसी वस्तु को अग्नि पर पकाकर आंच देना बन्द कर देते हैं, जब वह वस्तु वायुमण्डल की शीतता से चूल्हे पर स्थित ही शीतल हो जाती है उसको स्वाङ्गशीतल कहते हैं ॥ ६० ॥
अथ वहिःशीतलम्—
अग्नेराकृष्य शीतं यत्तद्वहिः शीतमुच्यते ॥ ६१ ॥
किसी वस्तु का अग्नि मे पाक कर फिर उसको अग्नि से नीचे रख कर शीतल करते हैं इसको बहिःशीत कहते हैं ॥ ६१ ॥
अथ स्वेदनलक्षणम्—
क्षाराम्लैरौषधैर्वाऽपि दोलायन्त्रे स्थितस्य हि ।
पचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम् ॥ ६२ ॥
क्षार (जवाखार, सुहागा, इत्यादि) तथा अम्ळवर्ग की औषधियों का स्वरस दोलायन्त्र में भर कर उस में पारद, लोह, शंख, शुक्ति इत्यादि पदार्थों को उनके साथ पाचन करते हैं, इसको स्वेदन संस्कार कहते हैं। स्वेदन संस्कार करने से उस धातु का कुछ मल भाग पृथक् हो जाता है ॥ ६२ ॥
अथ मर्दनलक्षणम्—
उदितै रौषधैः सार्धं सर्वाम्लः काञ्जिकैरपि ।
पेषणं मर्दनाख्यं स्याद्वहिर्मलविनाशनम् ॥ ६३ ॥
भिन्न २ वस्तु के मर्दन के लिये कही हुई औषधियों के साथ या सर्वप्रकार के अम्ल पदार्थों के स्वरस द्वारा (जिसके लिये जिसका शास्त्र में निर्देश हो) अथवा काञ्जी के साथ पारद या अन्य पदार्थ का खरल में पेषण करते हैं। इसको मर्दन संस्कार भी कहते हैं, इस संस्कार से भी पारद या अन्य पदार्थों के बहिर्मल का विनाश होता है ॥ ६३ ॥
अथ मूर्च्छनलक्षणम्—
मर्दनाऽऽदिष्टभैषज्यैर्नष्टपिष्टत्वकारकम् ।
तन्मूर्च्छनं हि वङ्गाहि-भुजङ्गकञ्चुकनाशनम् ॥ ६४ ॥
मर्दनसंस्कार में कही हुई औषधियों के चूर्ण, स्वरस या क्वाथ के साथ पारद को घोटकर उसकी कज्जली या पिण्ड अथवा सूक्ष्म चूर्ण कर लेते हैं इसको