रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextअष्टमोऽध्यायः ।
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अथ अभिषेकः—
द्रुते वह्निस्थिते लोहे विरम्राष्टनिमेषकम् ।
सलिलस्य परिक्षेपः सोऽभिषेक इति स्मृतः ॥ ५५ ॥
वह्नि के संयोग से द्रुत हुए लोहादिक में आठ निमेष के पश्चात् जो जल का छिड़काव दिया जाता है या जल डाला जाता है उसको अभिषेक कहते हैं ॥ ५५ ॥
अथ निर्वापलक्षणम्—
तप्तस्याप्सु विनिक्षेपो निर्वापः स्नपनं च तत्॥ ५६॥
प्रतप्त लोह (सप्त या अष्ट धातु) को किसी औषधि के स्वरस में बुझाने को स्नपन या निर्वाप कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्रतिवापसमयनिर्देशः—
प्रतीवापादिकं कार्यं द्रुते लोहे सुनिर्मले ॥ ५७ ॥
जब लोह अग्नि से द्रव होकर निर्मल हो जाय तभी उसका प्रतीवाप, स्नपन, और अभिषेक करना चाहिए ॥ ५७ ॥
अथ शुद्धावर्तः—
यदा हुताशो दीप्तार्चिः शुक्लोत्थानसमन्वितः ।
शुद्धावर्तस्तदा ज्ञेयः स कालः सत्त्वनिर्गमे ॥ ५८ ॥
जब अग्नि अच्छी तरह से प्रज्वलित हो जाय और उसमें से शुक्लता लिये हुए लालरंग की तीव्र लपटें निकलने लगें उस समय उसको शुद्धावर्त कहते हैं, धातुओं का सत्त्व इसी अवस्था में निकलता है, अर्थात् धातुओं के सत्त्व को उत्तम रीति से निकालने के लिये इतनी तेज आँच करनी आवश्यक है ॥ ५८ ॥
अथ बीजावर्तः—
द्राव्यद्रव्यनिभा ज्वाला दृश्यते धमने यदा ।
द्रावस्योन्मुखता सेयं बीजावर्तः स उच्यते ॥ ५९ ॥
किसी धातु का द्रावण करने के लिये उसको अग्नि में रख कर धौंकनी से धौंकते हैं, उस समय अग्नि में उस धातु के रंग के सदृश ज्वाला दिखाई देती है इसी समय में उस धातु का द्रव होना प्रारम्भ होता है इसको बीजावर्त कहते हैं ॥ ५९॥
अथ स्वाङ्गशीतलम्—
वह्निस्थमेव शीतं यत्तदुक्तं स्वाङ्गशीतलम् ॥ ६० ॥