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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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अष्टमोऽध्यायः।
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मूर्च्छन संस्कार कहते हैं । यह संस्कार पारद के नाग, वङ्ग आदि महादोषों (१) को नष्ट करता है । पारद के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भी मूर्च्छन संस्कार करने से गुणोत्कर्ष होता है ॥ ६४ ॥

अथोत्थापनादिलक्षणम्—

स्वेदातपादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् ।
तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥ ६५ ॥

मूर्च्छन संस्कार के कारण विरूपित हुए (नष्टपिष्ट हुए) पारद को फिर दोलायंत्र द्वारा स्वेदन करके या अग्नि और सूर्य के सन्ताप के द्वारा अपने पूर्व रूप में ले आते हैं, इसी को उत्थापन संस्कार कहते हैं । क्योंकि इस संस्कार से पारद पुनः स्वस्वरूप को ग्रहण कर लेता है ॥ ६५ ॥

बन्धलक्षणम्—

स्वरूपस्य विनाशेन पिष्टत्वादूध्वन्धनं हि तत् ।
विद्वद्भिर्निर्जितः सूतो नष्टपिष्टिः स उच्यते ॥ ६६ ॥

गन्धकादिक भिन्न २ पदार्थों के साथ पारद को घोटने से उसका श्वेत और चपलगुण नष्ट होकर चूर्ण या कज्जली बन जाती है और इस पेषण के कारण उसका बन्धन (मूर्तिबद्धरूप अथवा वह्निनाऽनुच्छिद्यमानत्व) हो जाता है । इस प्रकार से जीते हुए (स्वाधीन किये हुए) पारद का विद्वान् लोग नष्टपिष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥

अथ पातनलक्षणम् —

उक्तौषधैर्मर्दितपारदस्य यन्त्रास्थितस्योर्ध्वमधश्च तिर्यक् ।
निर्यातनं पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिसम्पर्कजकञ्चुकघ्नम् ॥ ६७ ॥

स्वेदन, मर्दनादिक संस्कार में बताई हुई तथा अन्य शास्त्रोक्त औषधियों के साथ पारद को खरल में घोट करके ऊर्ध्वपातन, अधः पातन और तिर्यक् पातन यन्त्रों में लेप कर के या चूर्ण रूप ही में रख कर क्रम से पारद को ऊपर, नीचे और तिर्यक् मार्ग से उड़ाते हैं, इस को पातन कहते हैं । इस पातन संस्कार से पारद के नाग और वङ्ग से उत्पन्न कंचुकादिक दोष नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में खनिज पारद में नाग, वङ्ग हरताल आदि बहुत से पदार्थ मिले रहते हैं । उन


( १ ) नागो वङ्गो मलोवह्निश्वापल्यञ्च विषंगिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥