रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२३२ रसरत्नसमुच्चये—
हिङ्गुल को अदरक के स्वरस में घोटकर विद्याधरयन्त्र के द्वारा ( उसमें लेपकर ) उड़ाकर निकाले हुए पारद को हिङ्गुलाकृष्ट पारद कहते हैं ॥ ३९ ॥
अथ घोषाकृष्टताम्रलक्षणम्—
स्वल्पतालयुतं कांस्यं वङ्कनालेन ताडितम् ।
मुक्तवङ्गं हि तत्ताम्रं घोषाकृष्टमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
कांस्य के अन्दर कुछ हरताल मिलाकर बङ्कनाल के द्वारा अग्नि में फूंकने से वङ्ग का भाग पृथक् हो जाता है और ताम्र पृथक् निकल जाता है इस ताम्र को घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं । कांस्य ताम्र और वंग के संयोग से बनता है उक्तविधि से ताम्र को पृथक् कर लेते हैं ॥ ४० ॥
अथ वरनागलक्षणम्—
तीक्ष्णनीलाञ्जनोपेतं ध्मातं हि बहुशो दृढम् ।
मृदु कृष्णं द्रुतद्रावं वरनागं तदुच्यते ॥ ४१ ॥
नाग को तीक्ष्ण लौह और नीलाञ्जन के साथ बहुत बार तेज आँच में फूंकने से जब वह अत्यन्त कोमल कृष्णवर्ण और अत्यन्त शीघ्र द्रुत होने लायक होजाय तब उसको वरनाग ( उत्तम सीस ) कहते हैं ॥ ४१ ॥
उत्थापनलक्षणम्—
मृतस्य पुनरुद्भूतिः सम्प्रोक्तोत्थापनाह्वया ॥ ४२ ॥
भस्म हुए लोह ( सप्तधातु ) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ फूंकने से वह अपने स्वरूप में आजाता है इसी को उत्थापन कहते हैं ॥ ४२ ॥
ढालनलक्षणम्—
द्रुतद्रवस्य निक्षेपो द्रवे तद् ढालनं मतम् ॥ ४३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रवित कर के द्रव में बुझाने से वह ढल (घन हो) जाती है, इसी को ढालन कहते हैं ॥ ४३ ॥
अथ नागसम्भूतचपलः—
त्रिंशत्पलमितं नागं भानुदुग्धेन मर्दितम् ।
विमर्द्य पुटयेत्तावद्यावत्कर्षावशेषितम् ॥ ४४ ॥
न तत्पुटसहस्रेण क्षयमायाति सर्वथा ।
चपलोऽयं समादिष्टो वार्तिकैर्नागसम्भवः ॥ ४५ ॥