Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 323 of 362

Read in context
Page 323

अष्टमोऽध्यायः। २३३

३० पल ( १२० तो० ) नाग का चूर्ण बनाकर मदार के दुग्ध से भावित करके घोटलें, फिर गजपुट में उसे फूंकदें, इसविधि से बार २ मदार के दुग्ध से घोट-कर पुट देते देते जब उसकी मात्रा एक कर्ष (एक तोला) शेष रह जाती है उसी को वार्तिककारों ( रसशास्त्रपरिभाषानिर्माताविद्वानों ) ने नाग से उत्पन्न चपल कहा है । इस एक तोले का फिर यदि हजारों पुट भी दिये जावें तो भी वह नष्ट नहीं होता है ॥ ४४-४५ ॥

अथ वङ्गसम्भूतचपलः—
इत्थं हि चपलः कार्यो वङ्गस्यापि न संशयः ॥ ४६ ॥

उपर्युक्त विधि से वङ्ग धातु को भी अर्कदुग्ध से भावित कर अनेक पुट द्वारा उससे चपल का निर्माण किया जाता है ॥ ४६ ॥

चपलकार्यम्—
तत्स्पृष्टहस्तसंस्पृष्टः केवलो बध्यते रसः ॥ ४७ ॥

इस चपल को हाथों में मलकर पारद का स्पर्श मात्र करने से उसका बन्धन ( गोली ) हो जाता है, यह चपल का प्रभाव है ॥ ४७ ॥

बद्धरसोपयोगः—
स रसो धातुवादेषु शस्यते न रसायने ।
अयं हि खर्वणाख्येन लोकनाथेन कीर्तितः ॥ ४८ ॥

चपल के द्वारा बद्ध हुए रस का उपयोग धातु वाद ( लोह से स्वर्ण बनाने ) में होता है । रसायन कर्म में इस पारे का उपयोग नहीं करना चाहिए । यह विधि खर्वण नामक लोकनाथ ने कही है ॥ ४८ ॥

अथ धौतम्—
भूभुजङ्गशकृत्तोयैः प्रक्षाल्यापहृतं रजः ।
कृष्णवर्णं हि तत्प्रोक्तं धौताख्यं रसवादिभिः ॥ ४९ ॥

केञ्चुओं की विष्ठा को जल में घोल ( विलयन ) बना कर उस घोल में राख ( अर्थात् चपल बनाते समय जो नाग या वङ्ग का भाग राख में रह जाता है उसे ) को घुलाकर छानने से जो काले वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है उसको रसवादी धौत नाग और धौतवङ्ग कहते हैं । कुछ लोगों का यह अभिप्राय है कि केवल केञ्चुओं की विष्ठा को पानी में घोलकर छानने से जो कृष्ण वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है वह धौत कहा जाता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है ॥ ४९ ॥