रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextअष्टमोऽध्यायः । २३१
शुद्ध अभ्रक के छोटे २ टुकड़े ( चूर्ण ) बनाकर उसको धान के साथ ( भूषी युक्त चावल ) एक वस्त्र में रखकर पोटली बांध लेते हैं, फिर उस पोटली को काञ्जी में भिगोकर रख देते हैं । बाद में पोटली को कूटने से उसमें से जो अभ्रक का चूर्ण निकलता है उसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ ३५ ॥
अथ सत्त्वलक्षणम्—
क्षाराम्लद्रावकैर्युक्तं ध्मातमाकरकोष्ठके ।
यस्ततो निर्गतः सारः सत्त्वमित्यभिधीयते ॥ ३६ ॥
किसी धातु की भस्म को क्षार ( टंकण ) अम्ल ( काञ्जी ) और द्रावकवर्ग ( गुञ्जा, मधु, घृत, गुड़, ) के पदार्थों के साथ मिला कर कोष्ठिकायन्त्र में या मूषामें रखकर फूंक देने से जो उस भस्म का सार निकलता है उसको सत्त्व कहते हैं ॥ ३६ ॥
अथ एककोलिसकलक्षणम्—
कोष्ठिका शिखरापूर्णैः कोकिलैर्धमनियोगतः ।
मूषाकण्ठमनुप्राप्यैरेककोलीसको मतः ॥ ३७ ॥
एक कोष्ठिका को कोयलों से भरकर उन के बीच में द्रव्यों से भरी मूषा रखकर धौंकनी से फूंकना चाहिये । जब तक मूषा के भीतर का पदार्थ ( धातु ) उड़कर उसके कण्ठ में संलग्न न हो जाय तबतक यह क्रिया जारी रखनी चाहिए, इसी का नाम एककोलीसक है ॥ ३७ ॥
अथ द्रावणादिकर्मसाधने काष्ठनिर्देशः—
द्रावणे सत्त्वपाते च माधुकाः खादिराः शुभाः ।
दुर्द्भावे वंशजास्ते तु स्वेदने बादराः शुभाः ॥ ३८ ॥
किसी धातु के द्रावण या सत्त्वपातन करने के लिये महुए या खैरके काष्ठ या कोयले श्रेष्ठ हैं तथा जो वस्तु कठिनता से द्रव होती है उसके लिये बांस के काष्ठ या कोयले और स्वेदन कर्म में बैर के कोयलों अथवा लकड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टरसः—
विद्याधराख्ययन्त्रस्थादार्द्रकद्रावमर्दितात् ।
समाकृष्टो रसो योऽसौ हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ३६ ॥