रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१८० रसरत्नसमुच्चये—
रुद्ध्वा गजपुटे पच्याद्दिनं क्वाथेन मर्दयेत् ।
दिवा मर्द्यं पुटेद्रात्रावेकविंशदिनावधि ।
एकविंशत्पुटैरेवं म्रियते त्रिविधं ह्ययः ॥ १२८ ॥
गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर उससे २१ दिन तक लौह को भावित करें, फिर उसी क्वाथ से उस लौह को एक दिन तक खूब घोट करके सम्पुट कर गजपुट द्वारा रात्रि में पुट दे देवें, फिर निकालकर उसी क्वाथ से दिन में घोटकर रात्रि में पुट देवें इस तरह २१ पुट देने से तीनों प्रकार के लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥
अथ कान्तलोहस्य रामराजीप्रोक्तशोधनम्—
यत्पात्राध्युषिते तोये तैलबिन्दुर्न सर्पति ।
तारेणावर्तते यत्तत्कान्तलोहं तनूकृतम् ॥ १२६ ॥
अयसामुत्तमं सिञ्चेत्तप्तं तप्तं वरारसे ।
एवं शुद्धानि लोहानि पिष्टान्यम्लेन केनचित् ॥ १३० ॥
मृतसूतस्य पादेन प्रलिप्तानि पुटानले ।
पचेत्तुल्यस्य वा ताप्यगन्धाश्महरतेजसा ॥ १३१ ॥
तप्तं क्षाराम्लसंलिप्तं शशरक्तेन भावितम् ।
कान्तलोहं भवेद्भस्म सर्वदोषविवर्जितम् ॥ १३२ ॥
जिस लौह के जल से भरे हुए पात्र में तैल की बूंद छोड़ने पर वह फैले नहीं और जो लौहचूर्ण रजत चूर्ण के साथ मिश्रित हो जाय या उसको चारों ओर घेरले उस सर्वलौहो में उत्तम कान्त लौह के छोटे २ पत्र या टुकड़े बना करके प्रतप्त कर त्रिफला के क्वाथ में सात वार बुझाकर शुद्ध करलें, पश्चात् उसे निम्बू के रस या किसी अम्लरस से घोट करके चतुर्थांश पारदभस्म से मर्दनद्वारा लिप्तकर पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। अथवा लौह चूर्ण या पत्र को अम्लरस में घोटे हुयेक्षार से लिप्त करके तपाकर खरगोश के रुधिर में सातवार बुझालें, पश्चात् लौह के बराबर सुवर्णमाक्षिक, गन्धक और पारद इनके साथ लौह पत्रों को घोटकर सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूंक दें, इस तरह लौह को सर्वदोष रहित भस्म हो जाती है ॥ १२९-१३२ ॥