रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । १८१
अन्यविधिः—
शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं खल्लेन कृतकज्जलम् ।
द्वयोः समं लौहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ १३३ ॥
यामद्वयात्समुद्धृत्य यद्गोलं ताम्रपात्रके ।
आच्छाद्यैरण्डपत्रैश्च यामार्धेऽत्युष्णतां व्रजेत् ॥ १३४ ॥
धान्यराशौ न्यसेत्पश्चात्रिदिनान्ते समुद्धरेत् ।
सम्पेष्य गालयेद्वस्त्रे सत्यं वारितरं भवेत् ।
कान्तं तीक्ष्णं च मुण्डं च निरुत्थं जायते मृतम् ॥ १३५ ॥
स्वर्णादीन्मारयेदेवं चूर्णं कृत्वा च लौहवत् ।
सिद्धयोगो ह्ययं ख्यातः सिद्धानां सुमुखांगतः ॥ १३६ ॥
अनुभूतं मया सत्यं सर्वरोगजरापहम् ।
त्रिफलामधुसंयुक्तं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ १३७ ॥
**अन्यविधि—**शुद्ध पारद से द्विगुण गन्धक लेकर खरल में कजली बनालें, इस कजली के बराबर लौह चूर्ण लेकर उसको घृत कुमारी के रस में दो प्रहर तक घोट करके गोला बनालेवें, पश्चात् उस गोले को ताम्र के पात्र में रख कर रेड़ी के पत्रों से ढककर आधे प्रहर तक अग्नि में या सूर्य की धूप में रहने दें, फिर उस गोले को तीन दिन तक धान्य के ढेर में गाड़ना चाहिए, चौथे दिन निकाल कर लौह चूर्ण को पीसकर वस्त्र से छान लें, इस तरह कान्त, तीक्ष्ण और मुण्ड लौह की जल में तैरने लायक निरुत्थ भस्म हो जाती है। इसी विधि से सुवर्णादि धातुओं की भी भस्म हो जाती है। यह योग सिद्धों के मुख से कहा हुआ है इसलिये उसको सिद्धयोग कहते हैं और मैंने भी इसकी सत्यता का अनुभव किया है। यह सर्व व्याधियों को नष्ट करता है। इसको त्रिफला और शहद के साथ सर्व रोगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३३–१३७ ॥
अथ लौहप्रयोगः—
एतत्स्यादपुनर्भवं हि भसितं लोहस्य दिव्यामृतं
सम्यक् सिद्धरसायनं त्रिकटुकीवेल्लाज्यमध्वन्वितम् ।
हन्त्यान्निष्क-मितं जरामरणजन्याधींश्च सत्पुत्रदं
दिष्टं श्रीगिरिशेन कालयवनोद्भूतौ पुरा तत्पितुः ॥ १३८ ॥