रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 269 of 362
Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । | १७९
भस्त्राभ्यां सुदृढं ध्मात्वा त्रिशुलीनिर्गमावधि ।
अथोद्धृत्य क्षिपेत्क्वाथे त्रिफलागोजलात्मके ॥ १२२ ॥
तस्मादाहृत्य सन्ताड्य मृतमादाय लोहकम् ।
पुनश्च पूर्ववद् ध्मात्वा मारयेदखिलायसम् ॥ १२३ ॥
खण्डयित्वा ततो गन्धगुडत्रिफलया सह ।
पुटेत्त्रिंशतिवाराणि निरुत्थं भस्म जायते ॥ १२४ ॥
सर्व प्रकार के लौह चूर्ण को बड़हल के फल के रस से पीसे हुए गण्डदूर्वा, गन्धक, हींग, इन पदार्थों से लिप्तकर, फिर गण्डदूर्वा के कल्क को ऊपर नीचे रखकर लौह का गोला बना कर सुखा लें, फिर धौंकनी द्वारा जब तक विविध रंग की ज्वाला न निकले तब तक फूँकता रहे, बाद में पत्रों को निकाल कर त्रिफला क्वाथ और गोमूत्र में उन्हें बुझावें, फिर उसमें से निकालकर चूर्ण करके पूर्वानुसार फूँक के बुझाकर खरल में चूर्ण कर लें, पश्चात् लौह चूर्ण के समान गन्धक, गुड़ और त्रिफला चूर्ण ले कर सबको खरल में घोटकर के गोला बनाकर गजपुट में फूँक देवें, इस प्रकार ३० पुट देने से लौह की निरुत्थ भस्म हो जाती है॥१२१-१२४॥
अन्यविधिः—
समगंधमयश्चूर्णं कुमारीवारिभावितम् ।
पुटीकृतं कियत्कालमवश्यं म्रियते ह्ययः ॥ १२५ ॥
अथवा गन्धक और लौह चूर्ण बराबर २ लेकर घृत कुमारी के स्वरस में घोटकर के सम्पुट में बन्द कर आठ या दस पुट देने से अवश्य ही भस्म हो जाती है ॥१२५॥
अन्यविधिः—
जम्बीररससंयुक्तं दरदे तप्तमायसम् ।
बहुवारं विनिक्षिप्तं म्रियते नात्र संशयः ॥ १२६ ॥
निम्बू के रस में कुछ हिङ्गुल मिलाकर घोल बनालो, फिर इस घोल ( विलयन ) में लौह को प्रतप्त कर बुझावें, इस तरह २० या २५ बार बुझाने से लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२६ ॥
अन्यविधिः—
गोमूत्रस्त्रिफला काथ्या तत्कषायेण भावयेत् ।
त्रिःसप्ताहं प्रयत्नेन दिनकं मर्दयेत्पुनः ॥ १२७ ॥