रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१६४ रसरत्नसमुच्चये—
बड़ता हो, वह नेपाल संज्ञक ताम्र है। यह वमनादि विकारों से रहित तथा औषध कार्य में श्रेष्ठ होता है ॥ ४४ ॥
अथ रसकर्मानर्हताम्रलक्षणम्—
पाण्डुरं कृष्णशोणं च लघुस्फुटनसंयुतम् ।
रूक्षाङ्गं सदलं ताम्रं नेष्यते रसकर्मणि ॥ ४५ ॥
जो ताम्र पाण्डुर (श्वेतपीतवर्णमिश्रित), लालिमा लिये हुए काला, वजन में हलका, पीटने से चूर्ण होने वाला और रूक्षस्पर्शवाला तथा पत्रों की रचना-युक्त हो वह रस क्रिया में वर्जित है ॥ ४५ ॥
अथ गुणा:—
ताम्रं तिक्तकषायकं च मधुरं पाकेऽथ वीर्य्योष्णकं
साम्लं पित्तकफापहं जठररुक्कुष्ठामजन्तवन्तकृत् ॥
ऊर्ध्वाधः परिशोधनं विषयकृत् स्थौल्यापहं क्षुत्करं
दुर्नामक्षयपाण्डुरोगशमनं नेत्र्यं परं लेखनम् ॥ ४६ ॥
ताम्र तीता, कसैला, पाक होने पर मधुर, उष्णवीर्य्य, स्वाद में अम्ल, पित्त और कफ का नाशक, और उदरव्याधि, कुष्ठ, आमदोष, कृमिसमूह, स्थौल्य, अर्श, क्षय, पाण्डु इन रोगों को नष्ट करता है और नेत्रों के लिये हितकर, शरीर की मेदा का नाशक, भूख को बढानेवाला, ऊर्ध्व और अधः शरीर के भागों का (वमन तथा विरेचन द्वारा) शोधक और विष बाधा तथा यकृत् वृद्धि को दूर करता है॥४६॥
अथ ताम्रस्य दोषाः—
अशुद्धं ताम्रमायुघ्नं कान्तिवीर्य्यबलापहम् ।
वान्तिमूर्च्छाभ्रमोत्क्लेदं कुष्ठं शूलं करोति तत् ॥ ४७ ॥
उत्क्लेदभेदभ्रमदाहमोहास्ताम्रस्य दोषाः खलु दुर्धरास्ते ।
विशोधनात्तद्विगतस्त्रदोषं सुधासमंस्याद्रसवीर्यपाके ॥४८॥
अशुद्ध ताम्र आयुको नष्ट करता है तथा शरीर के बल, वीर्य्य और कान्ति को नष्ट करता है तथा वमन, मूर्च्छा, भ्रम, उत्क्लेद (चित्तग्लानि), कुष्ठ तथा शूल को उत्पन्न करता है किन्तु शुद्ध कर मृत ताम्र से उपर्युक्त दोष नहीं होते हैं । तथा और भी ताम्र के उत्क्लेद, भेद, भ्रम, जलन, मूर्च्छा ये दोष हैं जोकि बहुत प्रय-त्न से दूर किये जाते हैं। यथाविधि शोधन करने से ताम्र सर्वदोषों से रहित होकर रस वीर्य और विपाक में अमृत के समान गुण करता है ॥ ४७–४८ ॥