रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । १६३
अथ रौप्यप्रयोगः—
भस्मीभूतं रजतममलं तत्समौ व्योमभानू
सर्वैस्तुल्यं त्रिकटु सवरं सारघाज्येन युक्तम् ॥
लीढं प्रातः क्षपयतितरां यक्ष्मपाण्डूदराशः
श्वासं कासं नयनजरुजः पित्तरोगानशेषान् ॥ ४१ ॥
इति रजताधिकारः ।
रजतभस्म, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म इन तीनों को समान समान भाग की मात्रा में लेकर तीनों के बराबर त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पिप्पल) का चूर्ण लेकर घोट लें, पश्चात् इस योग में से उचित मात्रा (दो रत्ती) लेकर शहद और घृत के साथ प्रातः सेवन करने से यक्ष्मा, पाण्डु, अर्श, श्वास, कास, नेत्रविकार तथा समग्र पित्तजन्य रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ४१ ॥
अथ ताम्रम्—
ताम्रभेदाः—
म्लेच्छं नेपालकं चेति तयोर्नेपालकं वरम् ।
नेपालादन्यखन्युत्थं म्लेच्छमित्यभिधीयते ॥ ४२ ॥
ताम्र के म्लेच्छ और नेपाल ये दो भेद हैं। इन दोनों में नेपाल संज्ञक ताम्र श्रेष्ठ होता है। नेपाल देश की खानों के अतिरिक्त जिन खानों से ताम्र निकलता है वह म्लेच्छ कहलाता है ॥ ४२ ॥
अथ म्लेच्छताम्रस्य लक्षणम्—
सितकृष्णारुणच्छायमतिवामि कठोरकम् ।
क्षालितं च पुनः कृष्णमेतन्म्लेच्छकताम्रकम् ॥ ४३ ॥
जो ताम्र श्वेत, कृष्ण तथा कुछ लाल हो और अत्यन्त वमन कारक तथा कठोर हो और खूब धोने पर भी काला ही रहे वह म्लेच्छ ताम्र है ॥ ४३ ॥
अथ नेपालताम्रलक्षणम्—
सुस्निग्धं मृदुलं शोणं घनाघातक्षमं गुरु ।
निर्विकारं गुणश्रेष्ठं ताम्रं नेपालमुच्यते ॥ ४४ ॥
जो ताम्र स्निग्ध, कोमल, लालवर्ण, भारी, चोट मारने पर चूर्ण न होकर