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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 255 of 362

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Page 255

पञ्चमोऽध्यायः । | १६५


अथ ताम्रशुद्धिः—

ताम्रं क्षाराम्लसंयुक्तं द्रावितं दत्तगैरिकम् ।
निक्षिप्तं महिषीतक्रे छागणे सप्तवारकम् ।
पञ्चदोषविनिर्मुक्तं भस्मयोग्यं हि जायते ॥ ४९ ॥

ताम्र के अन्दर यवक्षार, काञ्जी या निम्बूरस और गैरिक मिला कर घोटें फिर उसे उपलों की अग्नि में द्रवित कर भैंस की तक्र ( मट्ठा ) में बुझावें । इस तरह सात बार द्रवकर बुझाने से पञ्चदोष ( उत्क्लेशभेदभ्रमदाहमोहाः ) से रहित भस्म हो जाती है ॥ ४९ ॥


मतान्तरम्—

ताम्रनिर्मलपत्राणि लिप्त्वा निम्ब्वम्बुसिन्धुना ।
ध्मात्वा सौवीरकक्षेपाद्विशुध्यत्यष्टवारतः ॥ ५० ॥

अथवा शुद्ध ताम्र के पत्रों पर निम्बू के रस में नीमक पीसकर लेप कर दें पश्चात् उन्हें प्रतप्त कर निर्गुण्डी (मेउड़ी) के स्वरस या क्वाथ में बुझावें, इस तरह आठ बार बुझाने से शुद्धि हो जाती है ॥ ५० ॥


मतान्तरम्—

निम्ब्वम्बुपटुलिप्तानि तापितान्यष्टवारकम् ।
विशुद्ध्यन्त्यर्कपत्राणि निर्गुण्ड्या रसमज्जनात् ॥ ५१ ॥

अथवा ताम्र के स्वच्छ पत्रों पर निम्बूरस से पिष्टलवण का लेप करके प्रतप्त कर उन्हें निर्गुण्डी के रस में बुझावें, इस तरह आठ बार करने से उनकी शुद्धि होती है ॥ ५१ ॥


मतान्तरम्—

गोमूत्रेण पचेद्यामं ताम्रपत्रं दृढाग्निना ।
शुद्ध्यते नात्र सन्देहो मारणं चाप्यथोच्यते ॥ ५२ ॥

अथवा ताम्र पत्रों को गोमूत्र में डालकर तीव्र अग्नि पर एक प्रहर तक पकाने से निश्चय ही वे शुद्ध हो जाते हैं, अब आगे ताम्र मारण बतलाते हैं ॥ ५२ ॥


ताम्रभस्म—

जम्बीररससम्पिष्टरसगन्धकलेपितम् ।
शुल्वपत्रं शरावस्थं त्रिपुटैर्याति पञ्चताम् ॥ ५३ ॥