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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 210 of 362

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Page 210

१२० रसरत्नसमुच्चये—

अथ शोधनम्—
अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सप्तवारकम् ।
शृङ्गवेररसैर्वाऽपि विशुद्ध्यति मनःशिला ॥ ९६ ॥
मैन शील को अगस्त्य वृक्ष के पत्र के स्वरस से या अदरक (आदी) स्वरस से सात वार भावना देने से शुद्ध हो जाती है ॥ ९६ ॥

मतान्तरम्—
जयन्तीभृङ्गराजोत्थरक्तागस्त्यरसैः शिलाम् ।
दोलायन्त्रे पचेद्यामं यामं छागोत्थमूत्रकैः ।
क्षालयेदारनालेन सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ९७ ॥
अथवा जयन्ती, भृङ्गराज, रक्त अगस्त्य इन में से किसी एक के रस से दोलायन्त्र में एक प्रहर स्वेदन करके पश्चात् उसी प्रकार बकरी के मूत्र में पकावे फिर काञ्जी से धोकर सब रोगों में प्रयोग करे ॥ ९७ ॥

अथ सत्त्वपातनम्—
अष्टमांशेन किट्टेन गुडगुग्गुलुसर्पिषा ।
कोष्ठ्यां रुद्ध्वा दृढं ध्माता सत्त्वं मुञ्चेन्मनःशिला ॥ ९८ ॥
शुद्ध मैनशील में अष्टमांश किट्ट ( मण्डूर ) और गुड़ गुग्गुल तथा घृत मिलाकर मूषायन्त्र में बन्दकर खूब फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९८ ॥

मतान्तरम्—
भूनागधौतसौभाग्यमदनैश्च विमर्दितैः ।
कारवल्लीदलाम्भोभिर्मूषां कृत्वाऽत्र निक्षिपेत् ॥ ९९ ॥
शिलां क्षाराम्लनिष्पिष्टां प्रधमेत्तदनन्तरम् ।
कोकिलाद्वयमात्रं हि ध्मानात्सत्त्वं त्यजत्यसौ ॥ १०० ॥
इति मनःशिलाधिकारः ।
अथवा केञ्चुए (भूनाग) का सत्त्व, सुहागा, मैनफल इनका चूर्ण कर करेले के रस से मूषा का निर्माण कर उसमें क्षार और अम्ल रस में पिसी हुई मनः शिला रख कर कोयलों की आग में फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९९–१०० ॥

अथाञ्जनानां सन्निरूपणम्—
अञ्जनभेदाः—
सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् ।