Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 209 of 362

Read in context
Page 209

तृतीयोऽध्यायः । ११९

राख से अच्छी प्रकार पोटली को ढक दें कुछ काल के बाद ताम्र पर निकली हुई । श्वेत और मृदु सत्त्व को रस और रसायन के लिये ग्रहण करे ।॥ ८४-९० ॥

अथ मनःशिलानिरूपणम्—

मनःशिलाया भेदाः—
मनःशिला त्रिधा प्रोक्ता श्यामाङ्गी कणवीरका ।
खण्डाख्या चेति तद्रूपं विविच्य परिकथ्यते ॥ ९१ ॥

मनःशिला तीन प्रकार की होती है । (१) श्यामाङ्गी, (२) कणवीरका, (३) खण्डाख्या, ॥ ९१ ॥

त्रिविधमनःशिलालक्षणानि—
श्यामा रक्ता सगौरा च भाराढ्या श्यामिका मता ।
तेजस्विनी च निर्गौरा ताम्राभा कणवीरका ॥ ९२ ॥
चूर्णीभूताऽतिरक्ताङ्गी सभारा खण्डपूर्विका ।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठा भूरिसत्त्वा प्रकीर्तिता ॥ ९३ ॥

जो काली, लाल तथा गौर (सर्षपवर्ण) वर्ण मिश्रित और भारी होती है उसको श्यामाङ्गी कहते हैं। जो तेज युक्त तथा ताम्र समान चमकदार हो और गौर-वर्ण रहित हो उसको कणवीरका कहते हैं और जो चूर्ण के रूप में हो तथा अत्यन्त रक्त तथा भारयुक्त हो उसको खण्डाख्य मैन शील कहते हैं। इन तीनों में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ तथा ज्यादा सत्त्ववाली होती हैं ॥ ९२-९३ ॥

अथ गुणाः—
मनःशिला सर्वरसायनाग्र्या तिक्ता कटूष्णा कफवातहन्त्री ।
सत्त्वात्मिका भूतविषाग्निमान्द्यकण्डूतिकासाक्षयहारिणी च ॥ ९४ ॥

मनःशिला सब रसायनों में श्रेष्ठ तथा तिक्त, कटु, उष्ण और कफ, वात को नष्ट करती है तथा अधिक सत्त्व वाली शिला भूत, विष, अग्निमांद्य, कण्डू, कास और क्षय रोग को नष्ट करती है ॥ ९४ ॥

अशुद्धशुद्धदोषगुणाः—
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च अशुद्धा कुरुते शिला ।
मन्दाग्निं मलबन्धं च शुद्धा सर्वरुजापहा ॥ ९५ ॥

अशुद्ध मनःशिला अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मन्दाग्नि और मलबन्ध करती है, किन्तु शुद्ध करने पर सकल व्याधियों को नष्ट करती है ॥ ९५ ॥