रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२१८ | रसरत्नसमुच्चये—
क्षिप्तवा षोडशिकातैले मिश्रयित्वां ततः पचेत् ॥ ८४ ॥
ऽनावृतप्रदेशे च सप्तयामावधि ध्रुवम् ।
स्वाङ्गशीतमधःस्थञ्च सत्त्वं श्वेतं समाहरेत् ॥ ८५ ॥
छागलस्याथ बालेन बलिना च समन्वितम् ।
तालकं दिवसद्वन्द्वं मर्दयित्वाऽतियत्नतः ॥ ८६ ॥
युक्तं द्रावणवर्गेण काचकूप्यां विनिःक्षिपेत् ।
त्रिधा ताञ्च मृदा लिप्त्वा परिशोष्य खरातपे ॥ ८७ ॥
ततः खर्परकच्छिद्रे तामूर्ध्वां चैव कूपिकाम् ।
प्रवेश्य ज्वालयेदग्निं द्वादशप्रहरावधि ॥
कूपिकण्ठस्थितं शीतं शुद्धं सत्त्वं समाहरेत् ॥ ८८ ॥
पलार्धप्रमितं तालं बद्ध्वां वस्त्रे सिते दृढे ।
बलिनाऽऽलिप्य यत्नेन त्रिवारं परिशोष्य च ॥ ८९ ॥
द्राविते त्रिपले ताम्रे क्षिपेत्तालकपोटलीम् ।
भस्मनाच्छादयेच्छीघ्रं ताम्रेणाऽऽवेष्टितं सितम् ॥
मृदुलं सत्त्वमादद्यात्प्रोक्तं रसरसायने ॥ ९० ॥
इति तालकाधिकारः—
एक पल (चार तोले) भर शुद्ध हरताल को मदार के दुग्ध से एक दिन तक घोटकर एक पल तिल के तैल में मिश्रण कर खुले स्थान में वालुका यन्त्र द्वारा सात प्रहर तक पाक करना चाहिए । स्वाङ्ग शीत होने पर नीचे निकले हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करें अथवा छाग के पुच्छ के बाल और गन्धक को हरताल के साथ दो दिन तक घोटकर उसमें द्रावक वर्ग के पदार्थ (शहद्, घी, सुहागा) मिलाकर काच कूपी ( आतसी शीशी ) में भर कर तीन कपड़ मिट्टी करके धूप में सुखालें फिर मध्यछिद्र युक्त मिट्टी के कुण्डे में बालु भर कर आतसी शीशी रख दें ( आधी शीशी बालु से ढकी रहनी चाहिए ) पश्चात्, २ प्रहर तक अग्नि देना चाहिये । स्वाङ्ग शीत होने पर कूपिकण्ठ में लगे हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करे । अथवा आधे पल ( २ तोला ) शुद्ध हरताल को श्वेत मजबूत वस्त्र में बांधकर पोटली बनालें । उस पोटली को तीन वार गोमूत्र में पिसे हुए गन्धक से लेपकर धूप में सुखाले । फिर तीन पल द्रव हुए ताम्र में पोटली रखकर