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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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५० रसरत्नसमुच्चये-

( अ ) इसमें ऐरिजोना की निकासी भी सम्मिलित है ।
( ब ) इसमें भी ऐरिजोना और ओरेगन की निकासी मिली हुई है ।
( क ) टेक्सास के साथ निकासी दी गई है ।
( ख ) केवल ऐरिजोना की उत्पत्ति है ।
( ग ) एरिजोना ४० वाशिंगटन ७५ इडाहो ५ फ्लास्क है ।
( घ ) केवल इडाहो की निकासी है ।

दक्षिण अमेरिका ( South America )

ब्राजिल ( Brazil ) यहां पारद के खनिज पेट्रोलियम वाले शिलाजतु की भूमि में छोटे छोटे कणों के रूप में बिखरे पाये जाते हैं या सुवर्ण युक्त स्फटिक के साथ हिंगुल मिला पाया जाता है ।

चिली ( Chile )

इस देश में हिंगुल, रेड पाउडर ( Red Powder oxide ), गिरिसिन्दूर, प्राकृतिक पारद, टेट्रे हाईड्रैट ( Tetrahedrite ) आदि पारद के खनिज पाये जाते हैं । इन के सहयोग में रौप्यमाक्षिक, सुवर्णमाक्षिक, गरिक, कठिन स्फटिक आदि मिले रहते हैं । इसी जिले में प्राकृतिक पारद रजतमिश्रक चिरकाल से पारद निकालने के लिये ज्ञात रहा है । इसके आसपास के स्थानों में हिंगुल भी पाया जाता है ।

कोलम्बिया ( Columbia )

इस देश में हिङ्गुल सूक्ष्म चूर्ण के रूप में इधर उधर फैला हुआ पाया जाता है । रौप्यमाक्षिक और हिंगुल के साथ साथ प्राकृतिक पारद भी मिला पाया जाता है । सुवर्ण और रजत के प्राकृतिक पारदीय मिश्रक भी यहां पर प्राप्त होते हैं । यहां के खनिज हल्की जाति के होने के कारण पारद निकालने का व्यवसाय चिरकाल तक नहीं चल सकता है ।

डचगायना ( Dutchguina )

इस देश में ९ मील के फैलाव में हिङ्गुल का विस्तार मालूम हुआ और परीक्षा के लिये जो कूप खोदा गया उसमें २० फुट की गहराई पर उत्तम श्रेणी का खनिज प्राप्त हुआ । इस के उपरान्त यहाँ का विशेष विवरण प्रकाशित नहीं हुआ न व्यापार के लिये यहां कोई अध्यवसाय ही किया गया है ।

यूकोडर ( Ecuador )

यहां पर पारद निकालने का व्यवसाय बहुत प्राचीन काल से चलता है । आज कल खान में खनिज शेष नहीं है तथापि आसपास की भूमि में प्राकृतिक पारद पाया जाता है । कहीं कहीं पर हिङ्गुल भी मिला है ।

पेरू ( Perul )

पेरू के आदिम निवासी लोग हिङ्गुल को रङ्गसाज़ी में व्यवहार करते थे; ऐसी