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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 3, कुल 508 में से

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पृष्ठ 3

वक्तव्य

प्रस्तुत ग्रंथ 'रंगनाथ रामायण' को पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हुए हमें
बड़ा हर्ष हो रहा है । परिषद् का मूल उद्देश्य जहाँ अधिकारी विद्वानों द्वारा मौलिक
ग्रंथों का प्रणयन कराकर प्रकाशित करना रहा है, वहाँ देश और विदेश की समृद्ध
भाषाओं के उत्कृष्ट ग्रंथों का हिन्दी-अनुवाद कराकर उनके प्रकाशनों से हिन्दी-साहित्य
की समृद्धि में योगदान भी रहा है । इस प्रकार, परिषद् से अबतक जर्मन भाषा से
रिचर्ड पिशल-लिखित 'प्राकृत भाषाओं का व्याकरण' तथा फ्रेंच भाषा से मारिस मेटर-
लिंक-रचित नाटक 'नीलपक्षी' के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं । इन दोनों के अतिरिक्त
संस्कृत-साहित्य से 'काव्यमीमांसा' तथा 'कथासरित्सागर' ( प्रथम खंड ) के अनुवाद
मूल संस्कृत के साथ भी परिषद्-द्वारा प्रकाशित हुए हैं। 'कथासरित्सागर' का दूसरा खण्ड
इसी साल प्रकाशित होनेवाला है और उसके अन्तिम खण्ड का अनुवाद-कार्य सम्पन्न हो
रहा है । पाश्चात्य भाषाओं के साहित्य के अलावा परिषद् ने संविधान द्वारा स्वीकृत
चौदह भाषाओं और उनके साहित्य पर परिचयात्मक निबन्ध उन-उन भाषाओं के अधि-
कारी विद्वानों से लिखवाकर, उनके संग्रह के रूप में 'चतुर्दश भाषा-निबन्धावली' प्रकाशित
की है । तदुपरान्त भारत की प्रमुख लोकभाषाओं में से पन्द्रह लोकभाषाओं और उनके
साहित्य पर निबन्ध लिखवाकर 'पंचदश लोकभाषा-निबन्धावली' नाम का संग्रह प्रकाशित
किया है । उपर्युक्त पुस्तकों का हिन्दी-संसार में अच्छा स्वागत हुआ--यह हमारे लिए
प्रसन्नता की बात है ।
किन्तु, भारतीय भाषाओं के साहित्य से अनुवाद द्वारा हिन्दी-भाण्डार को भरने
की दिशा में परिषद् ने संकल्प किया था कि सर्वप्रथम दक्षिण भारत की चार—तमिल,
तेलुगु, कन्नड और मलयालम—भाषाओं के साहित्य से एक-एक ग्रंथ चुनकर अनूदित
कराया जाय । तदनुसार ही तमिल और तेलुगु के एक-एक ग्रंथ और उसके अनुवादक
का चुनाव किया गया और अनुवाद के काम सौंपे गये । इस योजना में हमें तेलुगु की 'रंग-
नाथ रामायण' के अनुवाद की पाण्डुलिपि सबसे पहले प्राप्त हुई और आज हम उसी
रामायण को आपके सामने उपस्थित करने में समर्थ हो सके हैं । हमें प्रसन्नता है कि
इसके बाद ही हम तमिल का 'कंब रामायण' का हिन्दी-अनुवाद भी यथाशीघ्र प्रकाशित
कर हिन्दी-संसार के सामने रख सकेंगे ।
मूल 'रंगनाथ रामायण' के सौष्ठव के सम्बन्ध में म ास-विश्वविद्यालय के विद्वान्
रीडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष श्रीनिडदवोलु वेंकट राव ने अपने परिचय में जो
उद्गार प्रकट किये हैं, वे इसी ग्रंथ में अन्यत्र देखने को मिलेंगे । फिर, इस ग्रंथ के
अनुवादक श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने भी, अपनी भूमिका में, तेलुगु-साहित्य का विवेचन करते
हुए इस ग्रंथ की महत्ता पर जो कुछ प्रकाश डाला है, वह अलम् है । उसके बाद इस