रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
by रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त)
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शुरू हुआ। यह आंदोलन आज तक चल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि तेलुगु के
पचहत्तर फी सदी लेखक अपनी साहित्य-साधना बोलचाल की भाषा के माध्यम से करते हैं।
साहित्यिक भाषा (ग्रांथिक भाषा) और बोलचाल की भाषा (व्यावहारिक भाषा) में
जो अन्तर हैं, वह विशेषतया क्रियाओं तथा कुछ शब्दो के रूपो तथा संधि के नियम-
पालन के ऊपर निर्भर करता है। एक उदाहरण से यह अन्तर स्पष्ट करेंगे।
साहित्यिक-भाषा--श्री राम चरित्रमु परम पावन मैनदि । अंदुवलनने तेलुगुलो
ननेकुलु रामायण-मुनिदिवरलो रचियिंचिरि । इप्पटिकिनि रचियुचु तम जन्ममुनु
चरितार्थमु गाविंचु कोनु चुन्नारु ।
व्यावहारिक भाषा--
श्रीराम चरित्र परम पावन मैंदि। अंदुवल्लने तेलुगुलो अनेकुलु रामायणान्नि यिदि
वरलो व्रासारु । इप्पटिकी व्रास्तू तम जन्मान्नि चरितार्थमु चेसुकुंटुन्नार ।
(श्रीराम की कहानी परम पावन है। इसलिए, कई लोगो ने अबतक रामायण की
रचना की। आज भी कुछ लोग इसकी रचना करते हुए अपने जीवन को चरितार्थ कर रहे हैं।)
जैसा हम पहले निवेदन कर चुके हैं, तेलुगु द्राविड़-भाषा-परिवार की एक मुख्य
भाषा है। किसी समय तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम मूल द्राविड़-भाषा की
बोलियां मात्र थीं। किन्तु, बाद को भिन्न-भिन्न वातावरण में पनपने के कारण आज ये
एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हैं। तेलुगु-प्रदेश पर कई राजवंशो ने राज्य किया।
सातवीं शताब्दी तक सातवाहन, इक्ष्वाकु, वृहत्फलायन, शालंकायन, पल्लव, विष्णुकुंडिन
तथा पूर्व चालुक्य राजाओ ने तेलुगु-प्रदेश पर राज्य किया था। इन राजाओ की राज-
भाषा या तो सस्कृत थी या प्राकृत। जो शिलालेख अबतक उपलब्ध हैं, उनमें बहुतों
की भाषा प्राकृत है। इन राजाओ में कुछ तो वैदिक धर्मावलंबी थे और कुछ बुद्ध के
अनुयायी थे। इस तरह तेलुगु-प्रदेश में राजभाषा तथा धर्म की भाषा की हैसियत से संस्कृत
तथा प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में देशभाषा पर पड़ता रहा।
परिणाम यह हुआ कि आज तेलुगु में पचहत्तर फी सदी शब्द सस्कृत या प्राकृत भाषाओ
के तत्सम या तद्भव रूप हैं। तेलुगु-प्रदेश के पंडितो का संस्कृत के प्रति इतना
अधिक आग्रह रहा कि तेलुगु का सब से प्रथम व्याकरण संस्कृत-भाषा में
लिखा गया।
तेलुगु की साहित्यिक भाषाके भी दो रूप मिलते हैं। एक रूप वह है, जो सस्कृत
शब्दों तथा समस्त पदो से भरा हुआ होता है और दूसरा वह, जिसमें ठेठ तेलुगु शब्दो
का ही बाहुल्य है। ठेठ तेलुगु को 'जानु तेनुगु' कहते हैं। इन दोनो रूपो में संस्कृत-
बहुल भाषा का ही अधिक आदर होता रहा और धीरे-धीरे ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
के बहुत-से शब्दों का प्रचलन कम होता गया। इसलिए, ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
को समझना बहुत-से तेलुगु-भाषाभाषियो के लिए भी आज कठिन-सा हो गया है।
ठेठ तेलुगु तथा संस्कृतबहुल तेलुगु के उदाहरणो को देखने से इन दोनों में अंतर स्पष्ट
हो जायगा--