रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
देहमें देवरूप ताको प्राप्त है जातहै जिनको देहत्यागहू को कष्ट नहीं होत इति
भावार्थः अथवा शूकर देह सहित जे जीव हैं ते स्वर्ग जातहै और देहधारी तौ
जातेही हैं ॥ २७ ॥
मू०-नवपदीछंद ॥ जहँ तहँ लसत महामदमत्त । वर
वारन वारन दलदत्त । अंग अंग चरचे अति चंदन । मुंडन
झुरके देखिय वंदन ॥ २८ ॥ दोहा ॥ दीह दीह दिग्गजन
के, केशव मनहुँ कुमार ॥ दीन्हीं राजा दशरथहि, दिगपाल
न उपहार ॥ २९ ॥ अरिल्लछंद ॥ देखि बाग अनुराग उप
जिय । बोलत कलध्वनि कोकिल सजिय ॥ राजति रति-
की सखी सुवेषनि । मनहुँ बहति मनमथ संदेशनि ॥ ३० ॥
टी०-ग्रामबाहर जहाँ तहाँ महावत हाथिनको फेरतहैं तिन का वर्णन है
सुमावोक्ति है अथवा स्थान पर बँधे हैं वारन हाथी तिनके दल चमू को अके
लेई दलि डारत हैं यासों अतिबली जानो अथवा बार कहे बेर नहीं लागति
शत्रुदलको दलि डारत हैं झुरके लगाये चन्दन रोरी ॥२८॥ दिक्पाल इन्द्रादि
उपहार भेंट ॥ २९ ॥ कल अव्यक्त मधुर ॥ ३० ॥
मू०-फूलि फूलि तरु फूल बढ़ावत । मोदत महामोद
उपजावत । उड़त परागन चित्त उठावत । भ्रमर भ्रमत
नहिं जीव भ्रमावत ॥ ३१ ॥ पादाकुलकछंद ॥ शुभ सर
शोभै मुनिमन लोभै । सरसिज फूले अलि रस भूले ॥ जल
चर डोलैं बहुखग बोलैं । बरणि न जाहीं उर अरु झाहीं ॥
॥ ३२ ॥ चतुष्पदीछंद ॥ देखीबनवारी चंचलभारी
तदपि तपोधन मानी । अति तपमय लेखी गृहथितपेखी जगत
दिगंबर जानी ॥ जग यदपि दिगंबरपुष्पवती नर निरखि
निरखि मन मोहै । पुनि पुष्पवती तन अति अति पावनगर्भ
सहित सब सोहै ॥ ३३ ॥