रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमप्रकाशः १. (११)
रामचन्द्रही में है और देव नहीं देसकत कहूं न रामलोक पाइ है पाठ है तौ
रामलोक वैकुंठ ॥ १६ ॥ प्रथम ईशत्व वर्णन करचो अब यामें रामचंद्रको
स्वभाव गुण वरण्यो है गमचन्द्रजू जो बोले सो फेरि नहीं बोले अर्थ जो
एक बान कह्यो सोई करचो है फेरि बदलि कै और बातनहीं कह्यो वन गमनादि
बचन ते जानो औ जाकों दान दियो ताको फेरि वही दीन्हों अर्थ एकही बार
ऐसो दियो जामें वाकें फेरि माँगिबेकी इच्छा नहीं रही विभीषणादि को लंका-
दानादि ते जानो और शत्रुको एकही बार ऐसा मारिकै नाश कियो जामें फेरि
नहीं मारिबे पर्यो खरदूषणादि वधते जानो औ संग्राम में जुरिकै नहीं मुरे
खरदूषण रावणादि के युद्धते जानों औ लोक की लीक मर्यादा को लोप नहीं
कियो रावण के बधसों ब्रह्मदोष मानि अश्वमेध करणादि सों जानो औ
दान औ सत्य औ सन्मान के सुयश करिकै दिशा औ विदिशा ओपी हैं अर्थ
जिनको सुयश दिशि विदिशन में छाइ रहा है औ जिनको मन लोभ औ
मोह औ मद औ काम के वश नहीं भयो राज्य त्यागादि सों लोभ विवशजानी
माता पिताको दुःखितहुए देखि वन गमन करणादि सो मोह विवश जानो औ
अगस्त्यादि ऋषिनके यथोचित सत्कार सों मद विवश जानी एक पत्नी व्रतसो
काम विवश जानो जाके ऐसे स्वभाव गुणहैं सोई श्रीराम वाराहादि अवतारन में
मुनिश्रेष्ठ अवतारी कहे अवतारको धरे साक्षात्परब्रह्म है अथवा श्रीराम अवतारी
कहे अनेक अवतारन को धरत हैं औ परब्रह्म हैं ॥ १७ ॥ अदृष्ट अंतर्द्धान इष्ट-
पूज्य देवता ॥ १८ ॥
मू०-गाहाछंद॥ रामचन्द्र पदपद्मं वृन्दारक वंदाभिवृंदनीयं॥
केशवमतिभूतनया लोचनंचंचरीकायते ॥ १९ ॥ चतुष्पदी-
छंद॥ जिनको यशहंसा जगत प्रशंसा मुनिजन मानसरंता ।
लोचन अनुरूपनि श्याम स्वरूपनि अंजन अंजित संता ॥
कालत्रयदर्शी निर्गुणदर्शी होत विलम्ब न लागै । तिनके गुण
कहिहौं सब सुख लहिहौं पाप पुरातन भागै ॥ २० ॥
टी०-वृंदारक जे देवताहैं तिनके वृंदसमूह तिन करिकै अभिवंदनीय अर्थ
जिनको अनेक देवता वन्दना करतहैं ऐसे जे रामचंद्र के पदपद्म पदकमल हैं तिन
प्रति केशवदास की मतिरुपी जो भूतनया सीता हैं ताके लोचन चंचरीकाय ते कहे
चंचरीक भ्रमरके ऐसे आचरण करत हैं अर्थ जब मुनि की आज्ञा सों राम-