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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 269 में से

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पृष्ठ 12

( ६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

सदृश जिनका एक मुख होतहै अर्थ बडे वक्ता होतहैं “मयूरेंगौचपुंसिस्यात्सुख-
शीर्षजलेषुकम्” इति मेदिनी ॥ “गंगीर्तगातुगीताचगौश्वधेनुःसरस्वतीत्येका-
क्षरी यजनेयः समाख्यातः” इत्येकाक्षरी ॥ १ ॥
मू०-बानी जगरानीकी उदारताबखानी जाइ ऐसीमति
कहौधौं उदार कौनकी भई । देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषि
राज तपवृद्ध कहिकहि हारेसब कहिन कहूँलई ॥ भावी भूत
वर्त्तमान जगत बखानतहै केशोदास केहूं न बखानी काहूपै
गई ॥ वर्णैपति चारिमुख पूतवर्णै पाँच मुख नाती बर्णै षट
मुख तदपि नईनई ॥ २ ॥
टीका-जगरानी कहं जगमें श्रेष्ठ ऐसी जेवाणी सरस्वती हैं तिनकी उदारता
बडाई जासों बखानी जाइ कहौ ऐसी मति बुद्धि उदारबडी कौने प्राणी की
भई है अर्थ काहूकी नहीं भई देवता बृहस्पति आदि औ प्रसिद्ध जे सिद्ध देव-
योनि विशेष हैं अथवा भृगु आदि ऋषिराज वाल्मीकादि अथवा सिद्ध जे ऋषि-
राज हैं तप वृद्ध लोमश मार्कण्डेय आदि जाकी उदारताको कहि कहि कहे वर्णि
वर्णिकै सब हारे हैं कहिकै सब उदारता काहू न लई कहे न पायी अर्थ उदार-
ताको अन्त न पायो हारे यासों कह्यो कि अब नहीं बखानत औ भावी कहे जे
हैंहैं औ भूत जे हैगये वर्तमान जेहैं जगत् कहे जगत्के प्राणी ते बखानत हैं सो
केशवदास कहते हैं कि केहूं कहे काहू प्रकार सों काहू प्राणीसों उदारता न बखानी
गई औ पति जे ब्रह्मा हैं ते चारि मुखसों औ पूत महादेव पांचमुखसों नाती
स्वामिकार्त्तिक षण्मुख सों वर्णतहैं ताहू पर नई नई कहे नवीन नवीन रहति है अर्थ
यह कि यहि प्रकार मुख वृद्धि सों वर्णत हैं परंतु इनको वर्णन जाकी उदारताको
छुइ नहीं सकत अथवा ज्यहिवाणीके पति चारिमुख औ पूतके पांच मुख
नातीको षण्मुख वर्णन करत हैं यासों या जनायो किचारिमुख सों संपूर्ण जगत
उत्पत्तिके कर्त्ता पंचमुखसों नाशकर्त्ता षण्मुखसों देवतनके रक्षक ऐसे पति
पुत्र नाती हैं जाके यासों बडी बडाई जनायो औ ताहूपर नवीन नवीन होति
जातिहै २ और अर्थ जामतिसो वाणी जो सरस्वती है तासों जगरानी सीता जू की
उदारता बखानी जाइ ऐसी मति वाणीकी कौनकी कीन्हीं भई है अर्थ कौने