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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 42 of 307

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साधना के प्राथमिक सोपान २९

तुम्हारा इन्द्रिय-सुख अनन्तगुना बढ जायगा,” तो अगणित लोग उसके पास दौड पडेगे। परन्तु यदि कोई कहे, “आओ, मै तुम लोगो को तुम्हारे जीवन का चरम लक्ष्य परमात्मा का विषय सिखलाऊँ,” तो शायद उनकी बात की कोई परवाह भी न करेगा। ऊँचे तत्त्व की धारणा करने की शक्ति वहुत कम लोगो मे देखने को मिलती है, सत्य को प्राप्त करने के लिए अध्यवसाय-शील लोगो की सख्या तो और भी विरली है। पर ससार मे ऐसे महापुरुष भी है, जिनकी यह निश्चित धारणा है कि शरीर चाहे हजार वर्ष रहे या लाख वर्ष, अन्त मे गति एक ही होगी। जिन शक्तियो के बल से देह कायम है, उनके चले जाने पर देह न रहेगी। कोई भी व्यक्ति पल भर के लिए भी शरीर का परिवर्तन रोकने मे समर्थ नही हो सकता। शरीर और है क्या? वह कुछ सतत-परिवर्तनशील परमाणुओ की समष्टि मात्र है। नदी के दृष्टान्त से यह तत्त्व सहज बोधगम्य हो सकता है। तुम अपने सामने नदी मे जलराशि देख रहे हो, वह देखो, पल भर मे वह चली गई और उसकी जगह एक नयी जलराशि आ गई। जो जलराशि आई, वह सम्पूर्ण नयी है, परन्तु देखने मे पहली ही जलराशि की तरह है। शरीर भी ठीक इसी तरह सतत परिवर्तन-शील है। उसके इस प्रकार परिवर्तनशील होने पर भी उसे स्वस्थ और वलिष्ठ रखना आवश्यक है, क्योकि शरीर की सहायता से ही हमे ज्ञान की प्राप्ति करनी होगी। इसके सिवा और कोई उपाय नही।

सब प्रकार के शरीरो मे मानव-देह ही श्रेष्ठतम है, मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है। मनुष्य सब प्रकार के निकृष्ट प्राणियो से—यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है। मनुष्य से