राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in context-२८ राजयोग
भीतर जो प्राण है, शायद उनको लक्ष्य कर गुरु ने पूर्वोक्त उपदेश दिया था। वे वापस चले गए। परन्तु फिर शीघ्र ही देखा कि भोजन करने पर प्राण तेजस्वी रहते है और न करने पर मुरझाने लगते हैं। तब वे पुन गुरु के पास आए और कहा, "गुरो, आपने क्या प्राणों को आत्मा कहा है?" गुरु ने कहा, "स्वय तुम इसका निर्णय करो, तुम वही हो।" उस अध्यवसायशील शिष्य ने गुरु के यहाँ से लौटकर सोचा, "तो शायद मन ही आत्मा होगा।" परन्तु वे शीघ्र ही समझ गए कि मनोवृत्तियाँ बहुत तरह की हैं, मन में कभी साधु-वृत्ति, तो कभी असत्-वृत्ति उठती है, अत मन इतना परिवर्तनशील है कि वह कभी आत्मा नही हो सकता। तब फिर से गुरु के पास आकर उन्होने कहा, "मन आत्मा है, ऐसा तो मुझे नही जान पडता। आपने क्या ऐसा ही उपदेश दिया है?" गुरु ने कहा, "नही, तुम ही वह हो, तुम स्वय इसका निर्णय करो।" वे देवपुगव फिर लौट गए, तब उनको यह ज्ञान हुआ, "मैं समस्त मनोवृत्तियो के अतीत एकमेवाद्वितीय आत्मा हूँ। मेरा जन्म नही, मृत्यु नही, मुझे तलवार नही काट सकती, आग नही जला सकती, हवा नही सुखा सकती, जल नही गला सकता, मै अनादि हूँ, जन्मरहित, अचल, अस्पर्श, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान पुरुष हूँ। आत्मा शरीर या मन नही, वह तो इन सबके अतीत है।" इस प्रकार देवता मे ज्ञान का उदय हुआ और वे तत्प्रसूत आनन्द से तृप्त हो गए। पर उस असुर विचारे को सत्यलाभ न हुआ, क्योकि देह मे उसकी अत्यन्त आसक्ति थी।
इस जगत् मे ऐसी असुर-प्रकृति के अनेक लोग है, फिर भी देवता-प्रकृतिवाले बिलकुल ही न हो, ऐसा नही। यदि कोई कहे, - "आओ, तुम लोगो को मैं एक ऐसी विद्या सिखाऊँगा, जिससे