Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 43 of 307

Read in context
Page 43

-३० राजयोग

श्रेष्ठतर जीव और नही। देवताओ को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्य-देह धारण करनी पडती है। एकमात्र मनुष्य ही ज्ञान-लाभ का अधिकारी है, देवता भी इसमे वञ्चित है। यहूदी और मुसलमानों के मत मे, ईश्वर ने, देवता और अन्यान्य समुदाय सृष्टियो के बाद मनुष्य की सृष्टि करके, देवताओं से मनुष्य को प्रणाम और अभिनन्दन कर आने के लिए कहा। इब्लिस को छोडकर बाकी सबने ऐसा किया। अतएव ईश्वर ने इब्लिस को अभिशाप दे दिया। इससे वह शैतान बन गया। उक्त रूपक के अन्दर यह महान् सत्य निहित है कि ससार मे मनुष्य-जन्म ही अन्य सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। पशु आदि तिर्यक्-सृष्टि तम प्रधान है। पशु किसी ऊँचे तत्त्व की धारणा नहीं कर सकते। देवता भी मनुष्य-जन्म लिए बिना मुक्तिलाभ नहीं कर सकते। देखो, मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए अधिक धन अनुकूल नही। फिर बिलकुल निर्धन होने पर भी उन्नति दूर रहती है। ससार मे जितने महात्मा पैदा हुए है, सभी मध्यम श्रेणी के लोगो से हुए थे। मध्यम श्रेणीवालो में सब विरोधी शक्तियो का समन्वय रहता है।

अब हम यथार्थ विषय पर आएँ। हमें अब प्राणायाम के सम्बन्ध मे आलोचना करनी चाहिए। देखें, चित्तवृत्तियो के निरोध से प्राणायाम का क्या सम्बन्ध है। श्वास-प्रश्वास मानो देह-यन्त्र का गतिनियामक मूल यन्त्र (fly-wheel) है। एक बृहत् इजिन पर निगाह डालने पर देखोगे कि एक बडा चक्र घूम रहा है और उस चक्र की गति क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर यन्त्रो में सञ्चारित होती है। इस प्रकार उस इजिन के अत्यन्त सूक्ष्मतम यन्त्र तक गतिशील हो जाते हैं। श्वास-प्रश्वास ठीक वैसा ही एक गतिनियामक चक्र है। वही इस शरीर के सब अगो मे जहाँ