Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 40 of 307

Read in context
Page 40

साधना के प्राथमिक सोपान

२७०

एक देवता और एक असुर किसी महापुरुष के पास आत्म-जिज्ञासु होकर गए । उन्होने उन महापुरुष के पास एक अरसे तक रहकर शिक्षा प्राप्त की । कुछ दिन बाद उन महापुरुष ने उनसे कहा, “तुम लोग जिसको खोज रहे हो, वह तो तुम ही हो ।” उन लोगो ने सोचा, “तो देह ही आत्मा है ।” फिर उन लोगों ने यह सोचकर कि जो कुछ मिलना था मिल गया, सन्तुष्ट-चित्त से अपनी-अपनी जगह को प्रस्थान किया । उन लोगो ने जाकर अपने-अपने आत्मीय जनो से कहा, “जो कुछ सीखना था, सब सीख आए । अब आओ, भोजन, पान और आनन्द मे दिन बिताएँ—हम ही वह आत्मा है, इसके सिवा और कोई पदार्थ नही ।” उस असुर का स्वभाव अज्ञान से ढका हुआ था, इसलिए इस विषय मे उसने अधिक अन्वेषण नही किया । अपने को ईश्वर समझकर वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो गया, उसने ‘आत्मा’ शब्द से देह समझी । परन्तु देवता का स्वभाव अपेक्षाकृत पवित्र था । वे भी पहले इस भ्रम मे पडे थे कि “ ‘मैं’ का अर्थ यह शरीर ही है, यह देह ही ब्रह्म है, इसलिए इसे स्वस्थ और सबल रखना, सुन्दर स्वच्छ वस्त्रादि पहनना और सब प्रकार के दैहिक सुखो का सम्भोग करना ही कर्तव्य है ।” परन्तु कुछ दिन जाने पर उन्हे यह बोध होने लगा कि गुरु के उपदेश का अर्थ यह नही हो सकता कि देह ही आत्मा है, वरन् देह से भी श्रेष्ठ कुछ अवश्य है । तब उन्होने गुरु के निकट आकर पूछा, “गुरो, आपके वाक्य का क्या यह तात्पर्य है कि देह ही आत्मा है? परन्तु यह कैसे हो सकता है ? सभी शरीर तो नष्ट होते है, पर आत्मा का तो नाश नही । ” आचार्य ने कहा, “तुम स्वय इसका निर्णय करो, तुम वही हो—तत्त्वमसि ।” तब शिष्य ने सोचा, शरीर के-