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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 265 of 307

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Page 265

२४८ राजयोग

व्याख्या—यह है आकाशतत्त्व, और यह उसका अनुभव करने के लिए यन्त्रस्वरूप कान है। इनमें संयम करने से योगी दिव्य कर्ण प्राप्त करते है। तब वे सब कुछ सुन सकते हैं। अत्यन्त दूर कोई बातचीत या शब्द होने पर भी वे उसे सुन सकते हैं।

कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाश-
गमनम् ॥४३॥

सूत्रार्थ—शरीर और आकाश के सम्बन्ध में चित्तसंयम करने से और (रुई आदि) हल्की वस्तु में संयम करने से योगी आकाश में गमन कर सकते हैं।

व्याख्या—आकाश ही इस शरीर का उपादान है; आकाश ने ही एक प्रकार से विकृत होकर इस शरीर का रूप धारण किया है। यदि योगी शरीर के उपादानभूत उस आकाश-धातु में संयम का प्रयोग करे, तो वे आकाश के समान हल्के हो जाते हैं और जहाँ इच्छा हो, वायु मे से होकर जा सकते हैं। ऐसा ही दूसरे के सम्बन्ध में भी है।

बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥४४॥

सूत्रार्थ—बाहर में मन की जो यथार्थ वृत्ति अर्थात् मन की धारणा है, उसका नाम है महाविदेहा, उसमें संयम का प्रयोग करने से, प्रकाश का जो आवरण है, वह नष्ट हो जाता है।

व्याख्या—अज्ञानवश मन सोचता है कि वह इस देह में से कार्य कर रहा है। यदि मन सर्वव्यापी हो, तो हम केवल एक ही प्रकार के स्नायुओ द्वारा क्यो आबद्ध रहेगे, इस अह को एक ही शरीर मे सीमाबद्ध करके क्यो रखेगे ? ऐसा करने का तो कोई कारण नही दिखता। योगी अपने इस अह-भाव को, जहाँ कही इच्छा हो वही अनुभव करना चाहते है। अह-भाव के चले