राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 266 of 307
Read in contextपातंजल-योगसूत्र-३ २४९
जाने पर इस देह में जो मानसिक वृत्तिप्रवाह जागरित होता है, उसे 'अकल्पिता वृत्ति' या 'महाविदेहा' कहते है। जब वे उसमे संयम करने में सफल होते है, तब प्रकाश के सारे आवरण नष्ट हो जाते हैं और समस्त अन्धकार एव अज्ञान नष्ट हो जाने के कारण सब कुछ उन्हे चैतन्यमय प्रतीत होता है।
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः ॥४५॥
सूत्रार्थ—भूतों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पांच प्रकार की अवस्थाओ में संयम करने से पांचो भूतों पर विजय प्राप्त हो जाती है।*
व्याख्या—योगी समस्त भूतो मे संयम करते हैं, पहले, स्थूल भूत में और फिर उसके बाद उसकी अन्यान्य सूक्ष्म अवस्थाओ मे संयम करते हैं। बौद्धो के एक सम्प्रदाय मे यह संयम विशेष रूप से प्रचलित है। वे मिट्टी का एक लोदा लेकर उसमे संयम का प्रयोग करते हैं, फिर क्रमश, वह जिन सब सूक्ष्म भूतो से निर्मित हुआ है, उन्हे देखना शुरू करते हैं। जब वे उसकी समस्त सूक्ष्म अवस्थाओ के बारे मे जान लेते हैं, तब वे उस भूत पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा ही अन्य सब भूतो के बारे में भी समझना चाहिए। योगी सभी पर जय प्राप्त कर सकते हैं।
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥४६॥
सूत्रार्थ—उससे अणिमा आदि सिद्धियों का आविर्भाव होता है, कायसम्पत् की प्राप्ति होती है और सारे शारीरिक धर्मों से बाधा नहीं होती।
* स्वरूप—पृथ्वी की ठोसता, जल की तरलता आदि। अन्वय—सत्त्व, रज और तम प्रत्येक भूत में व्याप्त है, यह जानना। अर्थवत्त्व—विशेष-विशेष भोग-प्रदान की सामर्थ्य।