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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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पातंजल-योगसूत्र-३ २४७

का प्रयोग करने से ही वह सिद्ध हो जायगा, क्योकि उनके मतानुसार, उनकी आत्मा ही सर्वव्यापी नही है, वरन् उनका मन भी सर्वव्यापी है। उनका मन उस सर्वव्यापी (समष्टि) मन का एक अंश मात्र है। पर अभी वह इस शरीर के स्नायुओ के भीतर से ही काम कर सकता है, किन्तु जब योगी इन स्नायविक प्रवाहो से अपने को मुक्त कर लेते है, तब वे दूसरे शरीर के द्वारा भी काम कर सकते हैं।

उदानजयाज्जलपंककण्टकादिष्वसंग उत्क्रान्तिश्च ॥४०॥

सूत्रार्थ— उदान नामक स्नायुप्रवाह पर जय प्राप्त कर लेने से योगी के शरीर से पानी या कीचड का सयोग नही होता, वे कांटों पर चल सकते हैं और इच्छामृत्यु होते हैं।

व्याख्या— उदान नामक जो स्नायविक शक्ति-प्रवाह फेफडे और शरीर के सारे ऊपरी भाग को चलाता है, उस पर जब योगी जय प्राप्त कर लेते हैं, तब वे अत्यन्त हल्के हो जाते हैं। वे फिर जल में नही डूबते, काँटो पर या तलवार की धार पर वे अनायास चल सकते हैं, आग मे खड़े रह सकते हैं और इच्छा मात्र से ही इस शरीर को छोड दे सकते हैं।

समानजयात्प्रज्वलनम् ॥४१॥

सूत्रार्थ— समान वायु को जीत लेने से (उनका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।

व्याख्या— वे जब कभी इच्छा करते हैं, तभी उनके शरीर से ज्योति बाहर निकल आती है।

श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥४२॥

सूत्रार्थ— कान और आकाश का जो परस्पर सम्बन्ध है, उसमें सयम करने से दिव्य कर्ण प्राप्त होता है।