रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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Read in context| ३३० | रघुवंशमहाकाव्ये |
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सूत्रेण निष्ठेतेरिनिः। "तत्पुरुषे कृति बहुलम्" इति सप्तम्या अलुक्। स्यास्थ्यन्स्थूणाम् इति वक्तव्यात्षत्वम्।
भाषार्थ—इस प्रकार उन देवताओं ने विष्णु की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न कर लिया। वह स्तुति भी उनकी झूठी प्रशंसा नहीं थी किन्तु भगवान् के गुणों का यथार्थ वर्णन था॥ ३३ ॥
तस्मै कुशलसंप्रश्नव्यञ्जितप्रीतये सुराः।
भयमप्रलयोद्वेलादाचचक्षुर्नैर्ऋतोदधेः ॥ ३४ ॥
अन्वयः—सुराः कुशलसप्रश्नञ्जितप्रीतये तस्मै अप्रलयोद्वेलात् नैर्ऋतोदधे भयम् आचख्युः।
तस्मा इति। सुरा देवाः कुशलस्य संप्रश्नेन व्यञ्जिता प्रकटीकृता प्रीतिर्यस्य तस्मै। लक्षितप्रसादायेत्यर्थः। अन्यथा अनवसरविज्ञप्तिर्मुखराणामिव निष्फला स्यादिति भावः। तस्मै विष्णवेऽप्रलये प्रलयाभावेऽप्युद्वेलादुन्मर्यादात् नैर्ऋतो राक्षसः स एवोदधिः तस्माद्भूयंम्। चख्युः कथितवन्तः।
भाषार्थ—भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर देवताओं से कुशल मंगल पूछा, इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि आजकल ऐसे राक्षस उत्पन्न हो गये हैं जिन्होंने बिना प्रलयकाल के आये ही समस्त संसार की मर्यादाओं को भंग करके सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है। अर्थात् मर्यादा भंग करने वाले रावणादि राक्षसों से हमें बहुत बड़ा कष्ट हो रहा है॥ ३४ ॥
अथ वेलासमासन्नशैलरन्ध्रानुनादिना।
स्वरेणोवाच भगवान्परिभूतार्णवध्वनिः॥ ३५॥
अन्वयः—अथ परिभूतार्णवध्वनिः भगवान् वेलासमासन्नशैलरन्ध्रानुनादिना स्वरेण उवाच।
अथेति। अथ वेलायामब्धिकूले समाासन्नानां सन्निकृष्टानां शैलानां रन्ध्रेषु गह्वरेष्वनुनादिना प्रतिध्वनिवता स्वरेण परिभूतार्णवध्वनिस्तिरस्कृतसमुद्रघोषो भगवानुवाच।
भाषार्थ—इसके बाद समुद्र से भी गम्भीर स्वर में जब भगवान् विष्णु उत्तर देने लगे, तब क्षीर समुद्र तट के निकटवर्ती पहाड़ों की कन्दरायें गूंज उठीं॥ ३५ ॥
पुराणस्य कवेस्तस्य वर्णस्थानसमीरिता।
बभूव कृतसंस्कारा चरितार्थैव भारती ॥ ३६ ॥