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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

३. अध्याय ७-१०: शिखर-निर्माण, उरुशृङ्ग, आमलक एवं कलश-स्थापन

१०२ प्रासादमण्डने
मस्तके तस्य छाद्यस्य शृङ्गयुग्मं प्रदापयेत् ।
सितशृङ्गस्तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२४॥
रत्नशीर्ष प्रासाद के भद्र के तीन उरुशृंगों मे से एक कम करके उस स्थान पर मत्तालम्ब
( गवाक्ष ) बनावें और उसके छाद्य के ऊपर दो शृंग चढ़ावें । ऐसा सितशृंग नाम का प्रसाद
ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२४॥
शृंग संख्या—कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १६ एक शिखर, कुल ५३
१३-भूधर और १४-भुवनमंडन प्रासाद—
तिलकं यद्युपरथे भूधरो नाम नामतः ।
छाद्यशृङ्गे तु तिलकं नाम्ना भुवनमण्डनः ॥२५॥
सितशृंग प्रासाद के उपरथ ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे, तो भूधर नाम का प्रासाद होता
है और छाद्य के दोनों शृङ्गों के ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे तो भुवनमंडन नाम का प्रासाद
होता है ॥२५॥
१५-त्रैलोक्यविजय और १६-क्षितिवल्लभ प्रासाद--
शृङ्गद्वयं चोपरथे तिलकं कारयेत् सुधीः ।
त्रैलोक्यविजयो भद्रं शृङ्गेण क्षितिवल्लभः ॥२६॥
इति सप्ताङ्गाः सप्तप्रासादाः ।
यदि उपरथ के ऊपर दो शृंग और एक तिलक किया जाय तो त्रैलोक्यविजय नामका
प्रासाद होता है और भद्र के ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ाया जाय तो क्षितिवल्लभ नाम का
प्रासाद होता है ॥२६॥
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्ररथे १६ उपरथे १६- भद्रे १२ एक शिखर कुल ५७, तिलक ८
१७-महीधर प्रासाद--
दशभागकृते क्षेत्रे भद्रार्धं भागमानतः ।
त्रयः प्रतिरथाः कर्णो भागभागाः समो भवेत् ॥२७॥
कर्णे प्रतिरथे भद्रे द्वे द्वे शृङ्गे प्रकारयेत् ।
रथोपरथे तिलकं ग्रन्यङ्गं च रथोपरि ॥२८॥
मत्तालम्बयुतं भद्रं प्रासादोऽयं महीधरः ।

पञ्चमोऽध्यायः १०३
समचोरस प्रासाद के तलका दस भाग करे । उनमें भद्रार्ध, कर्ण प्रतिकर्ण, रथ और
उपरथ ये प्रत्येक एक २ भाग का बनावें और इनका निर्गम भी एक २ भाग का रखें । भद्र का
निर्गम आधे भाग का रखें । कोना, प्रतिरथ और भद्र के ऊपर दो २ शृंग तथा रथ और
उपरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें । एवं रथ के ऊपर प्रत्यंग चढावे । भद्र मत्तालंब
( गवाक्ष ) वाला बनावें । ऐसा महीधर नाम का प्रासाद है ॥२७-२८॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ४१ । तिलक-
रथे ८, उपरथे ८
१८-कैलास प्रासादः—
भद्रे शृङ्गं तृतीयं च कैलासः १ शङ्करप्रियः ॥२६॥
महीधर प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक शृंग अधिक
चढावे तो कैलाश नाम का प्रासाद होता है। यह शंकर को
प्रिय है ॥२६॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे १२, प्रत्यंग ८ एक
शिखर कुल ४५ । तिलक-रथे ८ उपरथे ८
१६-नव मंगल और २०-गंधमादन प्रासाद—
भद्रे त्यक्त्वा रथे शृङ्गं नवमङ्गल उच्यते ।
तथा भद्रे पुनर्द्दद्यात् तदासौ गन्धमादनः ॥३०॥
कैलाश प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक ऊरुशृंग कम
करके रथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे तो नवमंगल नामका
प्रासाद होता है। यह नवमंगल प्रासाद के भद्र के ऊपर एक
ऊरुशृंग अधिक चढावे तो गंधमादन नाम का प्रासाद
होता है ॥३०॥
शृंगसंख्या-४१ । कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, रथे ८,
प्रत्यंग ८, एक शिखर । तिलक ८ उपरथे
२१- सर्वाङ्गसुन्दर और २२- विजयानन्द प्रासाद—
भद्रे त्यक्त्वा चोपरथे शृङ्गं सर्वाङ्गसुन्दरः ।
भद्रे दद्यात् पुनः शृङ्गं विजयानन्द उच्यते ॥३१॥
१. 'नाम नामतः' ।

१०४ प्रासादमण्डने
गंधमादन प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरःशृंग कम करके उपरथ के ऊपर एक २
शृंग चढ़ावें, तो सर्वांगसुन्दर नाम का प्रासाद होता है। इसके भद्रके ऊपर एक २ उरःशृंग
फिर चढ़ावे तो विजयानन्द नामका प्रासाद होता है ॥३१॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, रथे ८, भद्रे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ५७
२३-सर्वांगतिलक प्रासाद-
मत्तालंवयुतं भद्र-मुरुशृङ्गं परित्यजेत् ।
शृङ्गद्वयं च छाद्योर्ध्वे सर्वांगतिलकस्तथा ॥३२॥
विजयानंद प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक २ उरुशृंग कम कर के मत्तालंब (गवाक्ष)
बनावें और इस गवाक्ष के छाद्य के ऊपर दो शृंग रक्खें, तो सर्वांग तिलक नाम का प्रासाद
होजाता है ॥३२॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६ रथे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, भद्रे और गवाक्षे १६,
एक शिखर कुल ६५ शृंग
२४-महाभोग प्रासाद-
उरुशृङ्गं ततो दद्यान्मत्तालम्बसमन्वितम् ।
महाभोगस्तदा नाम सर्वकामफलप्रदः ॥३३॥
सर्वांग तिलक प्रासाद के गवाक्ष वाले भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढ़ाने से
महाभोग नाम का प्रासाद होता है। यह सब कार्य के फल को देने वाला है ॥३३॥
२५-मेरुप्रासाद-
कर्णे रथे प्रतिरथे शृङ्गमुपरथे तथा ।
मेरुरेष समाख्यातः सर्वदेवेषु पूजितः ॥३४
इति नवाङ्गा नवप्रासादाः ।
कर्ण, रथ, प्रतिरथ और उपरथ इन सबके ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ावे तो मेरु
नामक प्रासाद होता है, यह सब देवों में पूजनीय है ॥३४॥
प्रासादप्रदक्षिणा का फल--
'प्रदक्षिणात्रयं कार्यं मेरुप्रदक्षिणायतम् ।
फलं स्याच्छैलराज्यस्य मेरोः प्रदक्षिणाकृते ॥३५॥
१. 'प्रदक्षिणात्रये स्वर्गं-मेरौ पुंसां च यत्फलम् ।
इष्टकाशैलजे मेरौ तत्फलं प्रदक्षिणाकृते ॥' इति पाठान्तरे ।

पञ्चमोऽध्यायः १०५
सुवर्ण के मेरु पर्वत की तीन प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, उतना फल इस पाषाण
के बने हुये मेरुप्रसाद की तीन प्रदक्षिणा करने से होता है ॥३५॥
वैराज्यप्रमुखास्तत्र नागरा ब्रह्मणोदिताः ।
वल्लभाः सर्वदेवानां शिवस्यापि विशेषतः ॥३६॥
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे वैराज्यादिप्रासाद-
पञ्चविंशत्यधिकारनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥*
वैराज्यादि यह पचीस प्रासाद नागर जाति के है। ये स्वयं ब्रह्माजी के कहे हुए है।
इसलिए ये प्रासाद सब देवो के लिये प्रिय है। उनमे भी महादेवजी तो विशेष प्रिय है ॥३६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डनके वैराज्यादी प्रासाद
नामके पांचवे अध्यायकी सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता।
*विशेष जानने के लिये देखें अपराजितपृच्छा सूत्र-१५७
प्रा० १४

अथ प्रासादमण्डने षष्ठोऽध्यायः
केसरी आदि पचीसप्रासादों के नाम—
केसरी सर्वतोभद्रो नन्दनो १नन्दशालिकः ।
नन्दीशो २मन्दरश्चैव ३श्रीवृक्षश्चामृतोद्भवः ॥१॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥२॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभध्वजः ॥३॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
ब्रह्मविष्णुशिवाकार्णा—मन्येषां न कदाचन ॥४॥
केसरो १, सर्वतोभद्र २, नन्दन ३, नन्दशालिक ४, नन्दीश ५, मन्दर ६, श्रीवृक्ष ७,
अमृतोद्भव ८, हिमवान ९, हेमकूट १०, कैलाश ११, पृथिवीजय १२, इन्द्रनील १३, महा-
नील १४, भूधर १५, रत्नकूटक १६, वैडूर्य १७, पद्मराग १८, वज्रक १६, मुकुटोज्ज्वल १०,
ऐरावत २१, राजहंस २२, गरुड २३, वृषभध्वज २४, और-मेरु २५, ये प्रासादों के पचीस
नाम हैं। मेरु प्रासाद सब प्रासादों का राजा है और उसमें देवोंका निवास भी है, इसलिए यह
मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य, इन देवों के लिए बनाना चाहिये, परन्तु दूसरे
देवों के लिये यह नहीं बनाना चाहिये ॥१ से ४॥
पचीस प्रासादों की शृंग संख्या—
आद्यः पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरीनाम नामतः ।
४तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥५॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगवाला है। (चार कोने पर चार और एक मुख्य
शिखर इस प्रकार पांच) । अंतिम प्रासाद तक प्रत्येक प्रासाद के ऊपर अनुक्रमसे चार २ शृंग
बढानेसे पच्चीसवें मेरु प्रासादके ऊपर एक सौ एक शृंग होते हैं ॥५॥
१. 'नन्दिशालकः' । २. 'मन्दिर' । ३. 'श्रीवत्स' । ४. 'चतुर्णां क्रमतो वृद्धिः' ।

षष्ठोऽध्यायः १०७
अष्टविभागीय तलमान—
क्षेत्रेऽष्टांशैर्विभक्ते तु कर्णौ भागद्वयं भवेत् ।
भद्रार्धं कर्णतुल्यं तु भागेनैकेन निर्गमः ॥६॥
समचोरस प्रासाद के तलका आठ भाग करें, उनमे से दो भाग का कोना और दो भाग
का भद्रार्ध बनावें। इन अंगों का निर्गम एक २ भाग का रक्खे ॥६॥
दश और बारह विभागीय तलमान--
दशांशे सार्धभागं च भद्रार्धं च प्रतिरथः ।
कर्णौ द्विभागः सूर्यांशे भद्रार्धं च प्रतिरथः ॥७॥
समचोरस तलका दस भाग करें। उनमे से दो भाग का कोना, डेढ़ भाग का प्रतिरथ
और डेढ़ भाग का भद्रार्ध बनावे। यदि बारह भाग करना हो तो दो भाग का कर्ण, दो भाग का
प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे ॥७॥
चौदह विभागीय तलमान—
चतुर्दशविभक्ते तु कर्णाद्यं द्वादशांशवत् ।
भद्रपार्श्वद्वये कार्या भागभागेन नन्दिका ॥८॥
समचोरस तलका चौदह भाग करे । उनमे से कर्ण आदिका मान बारह विभागीय
तलमान के अनुसार रक्खें । अर्थात् कर्ण दो भाग, प्रतिकर्ण दो भाग, और भद्रार्ध दो भाग,
ऐसे बारह भाग और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की नन्दिका ( कोणी ) बनावे । ऐसे
कुल चौदह भाग होते है ॥८॥
सोलह विभागीय तलमान—
षोडशांशे प्रकर्त्तव्या कर्णप्रतिरथान्तरे ।
कोशिका भागतुल्या च शेषं चतुर्दशांशवत् ॥६॥
समचोरस तलका सोलह भाग करे । उनमे से कर्ण और प्रतिरथ के बीचमे एक २ भाग
की कोशिका बनावें । बाकी सब अंगो का मान चौदह विभागीय तलमान के बराबर समझे ।
अर्थात् कर्ण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो भाग,
इस प्रकार सोलह विभागीय तलमान होता है ॥६॥

१०८ प्रासादमण्डने
अठारह विभागीय तलमान--
अष्टादशांशे भद्रस्य पार्श्वे द्वे द्वे च नन्दिके ।
कर्त्तव्ये भागभागेन शेषं स्यात् षोडशांशवत् ॥१०॥
समचोरस तलका अठारह भाग करें। उनमें से भद्र के दोनों तरफ दो २ नन्दी एक २
भाग की बनावें । बाको सब सोलह विभागीय तलमान के बराबर जानें । जैसे—कर्ण दो भाग,
कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नन्दी एक भाग, दूसरी नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो
भाग, ऐसे अठारह भागीय तलमान जानें ॥१०॥
बीस विभागीय तलमान--
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशत्यंशविभाजिते ।
कर्णौ द्विभागो नन्दिका सार्धांशा पृथुविस्तरे ॥११॥
द्विभागस्तु प्रतिरथो नन्दिका सार्धभागिका ।
भद्रनन्दी भवेद् भागा भद्रार्धं युग्मभागिकम् ॥१२॥
समचोरस क्षेत्र के बीस भाग करें। उनमे से दो भाग का कर्ण, डेढ़ भाग की कोणी,
दो भाग का प्रतिरथ, डेढ़ भाग की नंदिका, एक भाग की भद्रनंदी और दो भाग-का भद्रार्ध,
इस प्रकार बीस भागीय तलमान बनावें ॥११-१२॥
बाईस विभागीय तलमान--
द्वाविंशतिकृते१ क्षेत्रे नन्द्ये का भद्रपार्श्वयोः ।
त्रयः प्रतिरथाः कर्णौ भद्रार्धं च द्वि भागिकम् ॥१३॥
समचोरस क्षेत्र के बाईस भाग करें। उनमे से भद्र के दोनों तरफ की नन्दी एक २ भाग
की बनावे । बाकी तीन प्रतिरथ ( रथ, उपरथ और प्रतिरथ ) कर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक दो २
भाग का रखे । इस प्रकार बाईस विभागीय तलमान होता है ॥१३॥
तलोंके क्रमसे प्रासाद संख्या--
एकद्वित्रित्रिकं त्रीणि वेदाश्चत्वारि पञ्च च ।
तलेषु क्रमतोऽष्टासु केऽप्याहुः शिखराणि हि ॥१४॥
१. 'द्वाविंशत्यंशके नन्दी भागैका' ।

षष्ठोऽध्यायः १०६
केसरी आदि प्रासादो की तल विभक्ति आठ है। उनमें क्रमशः एक, दो, तीन, तीन, तीन,
चार, चार और पाच प्रासाद है। अर्थात् आठ तल वाला प्रथम एक प्रासाद; दस तल का दूसरा और
तीसरा ये दो; बारह तल का चौथा, पाचवां और छट्ठा ये तीन प्रासाद; चौदह तल का सातवां,
आठवां और नवां ये तीन प्रासाद; सोलह तलका दसवां, ग्यारहवां और बारहवा ये तीन
प्रासाद, अठारह तलका तेरहवां, चौदहवां, पद्रहवां और सोलहवां ये चार प्रासाद; बीस तलका
सत्रहवां, अठारहवां, उन्नीसवां और बीसवा ये चार प्रासाद और बाईस तलका इक्कीस से
पच्चीस तक के पांच प्रासाद हैं। ऐसा किसी (क्षीरार्णव) का मत है ॥१४॥
शिखरं त्वेकवेदैकं षट्त्रिवेदयुगद्वयम् ।
तलेषु क्रमशः प्रोक्तो मूलसूत्रेऽपराजिते ॥१५॥
केसरी प्रासादों मे प्रथम आठ तलका, दोसे पांच ये चार प्रासाद दस तलका, छट्ठा
एक प्रासाद बारह तलका, सात से बारह ये छः प्रासाद चौदह तलका, १३ से १५ ये तीन
प्रासाद सोलह तलका, १६ से १९ ये चार प्रासाद अठारह तलका, २० से २३ ये चार प्रासाद
बीस तलका और चौबीसवां और पच्चीसवा ये दो प्रासाद बाईस तलका होता है। यह मूलसूत्र
अपराजितपृच्छा का मत है ॥१५॥
तलेष्वष्टासु विहिताः प्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
त्रयस्त्रयः क्रमेणैव चत्वारस्त्वष्टमे तले ॥१६॥
केसरी आदि पच्चीस प्रासादों की जो आठ तल विभक्ति हैं, उनमें प्रत्येक तल के तीन २
प्रासाद है और आठवा बाईस विभागीय तल के चार प्रासाद है ॥१६॥
त्रीणि त्रीणि स्वकीयानि द्वे द्वे परः परस्य च ।
शिखराणि विधेयानि विश्वकर्मवचो यथा ॥१७॥
ऊपर १६ वे श्लोक मे तलो के तीन २ प्रासाद बनाने की जो बात कही गई है। यह मेरा
स्वयं (मंडन) का मत है और नीचे के श्लोक १८ वे मे दो दो आदि प्रासाद लिखा है, यह
दूसरे का मत है। ये पच्चीस प्रासाद विश्वकर्मा के वचन के अनुसार बनाये हैं ॥१७॥
'द्विद्वये कपट्त्रयोऽष्टादि-तलेषु पञ्चसु क्रमात् ।
सप्तैव सप्तमे षष्ठे शिरांसि त्रीणि चाष्टमे ॥१८॥
१. 'द्विद्व्येक'

११० प्रासादमण्डने
आठ तल विभक्तियों में से पहले पांच तल विभक्ति के अनुक्रम से दो, दो, एक, छह और
तीन प्रासाद हैं। छठी तल विभक्ति का एक प्रासाद, सातवीं तल विभक्ति के सात और
आठवीं तल विभक्ति के तीन प्रासाद हैं ॥१८॥
भेदाः पञ्चाशदेकैकं प्रोक्ताः श्रीविश्वकर्मणा ।
तेनैकस्मिंस्तलेऽपि स्युः शिखराणि बहून्यपि ॥१९॥
केशरी आदि प्रत्येक प्रासाद के पचास २ भेद श्री विश्वकर्माजी ने किये हैं। एकही प्रासाद
तल के ऊपर अनेक प्रकार के शिखर बनाये जाते हैं ॥१९॥
रथिकां सिंहकर्णं च भद्रे कुर्याद् गवाक्षकान् ।
प्रत्यङ्गैस्तिलकाद्यैश्च शोभितं सुरमन्दिरम् ॥२०॥
रथिका, सिंहकर्ण, भद्र में गवाक्ष, प्रत्यंग और तिलक आदि आभूषणों से देवालय को
सुशोभित बनावें ॥२०॥
प्रासादाः केसरीमुख्याः सर्वदेवेषु पूजिताः ।
पुरराज्ञः प्रजादीनां कर्तुः कल्याणकारिकाः ॥२१॥
इति केसर्यादिप्रासादाः पञ्चविंशतिः ।
केशरी आदि जो पच्चीस प्रासाद हैं, वे सब देवों के लिये पूजित हैं। इसलिये बनानेवाले
तथा नगर के राजा और प्रजा का कल्याण करने वाले हैं ॥२१॥
निरंधार प्रसाद—
षट्त्रिंशत्करतोऽधस्ताद् यावद्धस्तचतुष्टयम् ।
विना भ्रमैर्निरन्धाराः कर्त्तव्याः शान्तिमिच्छता ॥२२॥
छत्तीश हाथ से न्यून चार हाथ तक, अर्थात् चार हाथ से लेकर छत्तीस हाथ तक के
विस्तार वाले प्रासाद शान्ति को चाहने वाले शिल्पी भ्रम (परिक्रमा) बिनाके निरंधार
(प्रकार वाले) भी बना सकता है। निरंधार प्रासादको परिक्रमा नहीं बनावें ॥२२॥
प्रासादतलाकृतिः—
वास्तोः पञ्चविधं क्षेत्रं चतुरस्रं तथायतम् ।
वृत्तं वृत्तायतं चैवाष्टास्रं१ देवालयादिषु ॥२३॥
१. अष्टास्रं देवालयादनु ।

षष्ठोऽध्यायः १११
चौरस, लंब चौरस, गोल, लंबगोल और आठ कोना वाला, इस प्रकार पांच आकार के
देवालय आदि के वास्तुक्षेत्र हैं ॥२३॥
लम्बचोरस प्रासाद—
विस्तारे तु चतुर्भाग-मायामे पञ्चभागिकम् ।
ऊर्ध्वं त्रिकलशान् कुर्यात् पृष्ठाग्रे सिंहकर्णकम् ॥२४॥
लंब चौरस प्रासाद के विस्तार में चार भाग और लंबाई मे पांच भाग करना चाहिये
और उसके छाद्य के ऊपर तीन गुम्बद (कलश) रखना चाहिये। तथा आगे और पीछे के
चारों कोने पर सिंह रखना चाहिये।
गोल, लंबगोल और अष्टास्र प्रासाद—
वृत्तायतं च कर्त्तव्यं व्यासार्धं वामदक्षिणे ।
कर्णान्तं च भ्रामयेद् वृत्तं २भद्राणि चाष्टकोणिका ॥२५॥
प्रासादो वर्तुलोऽष्टास्रः प्रायेणैकाण्डकः शुभः ।
कर्णे वा श्रेणयोऽण्डानां मण्डपं तत्स्वरूपकम् ॥२६॥
इति पंचक्षेत्राणि ।
गोल प्रासाद के विस्तार का आधा भाग गोल के दोनो तरफ बढ़ावे तो लंबगोल प्रासाद
होता है। तलके मध्यबिंदु से कोने तक व्यासार्ध मान करके एक गोल खींचा जाय तो गोल-
प्रासादतल होता है। चौरस प्रासाद के चार भद्रो में कोना बनाया जाय तो अष्टास्र प्रासाद
होता है। गोल और अष्टास्र प्रासाद प्रायः करके एक शिखर वाला बनाना शुभ है। अथवा
शिखर के कोने मे शृंगो की पंक्ति रखनी चाहिये। इन प्रासादों का मंडप भी इसी स्वरूप का
बनाना चाहिये ॥२५-२६॥
नागर प्रासाद—
विविधै रूपसङ्घाटै-र्भद्रैर्गवाक्षभूषितैः ।
वितानफालनाभृङ्गै-रनेकैकैर्नागरा मताः ॥२७॥
अनेक प्रकार के तलाकृति वाले रूपों से, गवाक्ष वाले भद्रों से तथा अनेक प्रकार के
गुम्बदो से और अनेक शृंगयुक्त फालनाओं से शोभायमान नागर जाति का प्रासाद बनाया
जाता है ॥२७॥
२. वृत्ते भद्राणि चाष्ट हि ।

११२ प्रासादमण्डने
द्राविड प्रासाद—
पीठोपरि भवेद् वेदी पीठानि त्रीणि पञ्च वा ।
पीठतो द्राविडे रेखा लताशृङ्गादिसंयुता ॥२८॥
द्राविड प्रासाद को पादबंधनादि तीन अथवा पांच पीठ हैं, इस पीठ के ऊपर वेदी होती
है। तथा उसको रेखा (कोना) लता और शृंगों वाली होती है ॥२८॥
भूमिजप्रासाद—
भूमिकोपरिभूमिश्च १ह्रस्वा ह्रस्त्रा नवान्तकम् ।
विभक्तदलसंयुक्ता मूर्ध्नि शृङ्गेण भूमिजाः ॥२६॥
भूमिज जाति के प्रासाद एक के ऊपर एक ऐसे नव भूमि (माल) तक बनाया जाता
है। उसमें नीचे के मालसे ऊपर का माल छोटा २ किया जाता है। पदविभक्ति वाला और ऊपर
शृंग वाला भूमिज प्रासाद है ॥२६॥
लतिन श्रीवत्स और नागर जातिके प्रासाद—
शृङ्गेणैकेन लतिनाः श्रीवत्सा२ वारिसंयुताः ।
नागरा भ्रमसंयुक्ताः सान्धारास्ते प्रकीर्तिताः ॥३०॥
इति प्रासादजातय ।
लतिन जाति के प्रासाद एक शृंग वाले है, श्रोवत्स प्रासाद वारि मार्ग वाले हैं। नागर
प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाले है, उसको सांधार प्रासाद कहते है ॥३०॥
मेरुप्रासाद —
पञ्चहस्तो भवेन्मेरु–रेकोत्तरशताण्डकः ।
भेदाः पञ्चोनपञ्चाशत् करवृद्ध्या भवन्ति ते ॥३१॥
हस्ते हस्ते भवेद् वृद्धि–स्त्वण्डकानां च विंशतिः ।
एकोत्तरसहस्रं स्या–च्छृङ्गाणां च शताद्धिके ॥३२॥
मेरु प्रासाद पांच हाथ से न्यून नहीं बनाया जाता । पांच हाथ के विस्तार वाले
मेरु प्रासाद के ऊपर एकसौ एक शृंग चढ़ाये जाते है। यह पांच हाथ से एक २ हाथ पचास हाथ
तक बढ़ाने से पैंतालीस भेद होते है। बढ़ाये हुए प्रत्येक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ऊपर
१. 'ह्रस्वावर्कनवान्तकम्'. इति पाठान्तरे । २. 'श्रीवत्साम्बुपथान्विताः।'
३. यहा पञ्चाडी नवांडी आदि चार२ क्रम समझने का है ।

मोनाक्षाजी देवी के मंदिर की जगती के द्वार ऊपर का
गोपुर मडप - मदुरा ( दक्षिण )

तिरुवण्णाम् (दक्षिण) के मंदिर का एक गोपुर मंडप

षष्ठोऽध्यायः ११३
क्रमशः बीस २ शृंग अधिक चढाये जाते है। जैसे-पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के
ऊपर एक सौ एक, छह हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ इक्कीस, सात हाथ के प्रासाद के ऊपर
एकसौ इकतालीस, इस प्रकार बीस २ शृंग बढ़ाते हुए पचास हाथ के मेरु प्रासाद के ऊपर
एक हजार एक शृंग हो जाते है ॥३१-३२॥
विमान नागर प्रासाद—
केसरिप्रमुखाः कर्णे विमानमुरुशृंगकम् ।
तथैव मूलशिखरं पञ्चभूमिविमानकम् ॥३३॥
विमाननागरा जाति-स्तदा प्राज्ञैरुदाहृता ।
एवं शृङ्गैरुरुशृङ्गाणि सम्भवन्ति बहून्यपि ॥३४॥
जिस प्रासाद के कोने के ऊपर केसरी आदि के अनेक शृंग हों, और भद्र के ऊपर
उरुशृंग हो, तथा मूल शिखर पांच भूमि (माल) वाला विमानाकार हो, इसको विद्वानो ने
विमाननागर जाति का प्रासाद कहा है। इसके ऊपर अनेक शृंग और उरुशृंग
होते हैं ॥३३-३४॥
*१-श्रीमेरुप्रासाद और २-हेमशीर्ष मेरुप्रासाद—
श्रीमेरुरष्टभागः स्या-देकोत्तरशताण्डकः ।
हेमशीर्षो दशांशश्च युतः सार्धशताण्डकैः ॥३५॥
पहला श्रीमेरुप्रासाद आठ तलविभक्ति वाला और एकसौ एक शृंग वाला है। दूसरा
हेमशीर्ष मेरुप्रासाद दश तल विभक्तिवाला और डेढ़सौ शृंगवाला है ॥३५॥
३-सुरवल्लभ मेरुप्रासाद—
भागैर्द्वादशभिर्युक्तः सार्धद्विशतसंयुतः :
सुरवल्लभनामा तु प्रोक्तः श्रीविश्वकर्मणा ॥३६॥
कर्णो द्विभाग एकांशा कोणी सार्धः प्रतिरथः ।
अर्धांशा नन्दिका भद्र-मर्धं भागेन सम्मितम् ॥३७॥
तीसरा सुरवल्लभ नाम का मेरु प्रासाद बारह तल विभक्ति वाला और दोसौ पचास
(ढाईसौ) शृंगवाला है। ऐसा श्री विश्वकर्माजी ने कहा है। कोना दो भाग, कोणी एक भाग,

  • ये नव मेरु प्रासाद का स्वरूप सविस्तर जानने के लिए देखो अपराजित पृच्छा सूत्र. १८०
    प्रा० १५

११४ प्रासादमण्डने
प्रतिरथ डेढ़ भाग, कोशी आधा भाग और भद्रार्ध एक भाग, इस प्रकार बारह भाग की तल
विभक्ति है ॥३६-३७॥
४-भुवनमण्डन मेरुप्रासाद-
त्रिशतं पञ्चसप्तत्या--धिकैर्याण्डकैः सह ।
भक्तश्चतुर्दशांशैस्तु नाम्ना भुवनमण्डनः ॥३८॥
कोणः कोणी प्रतिरथो नन्दी भद्रार्धमेव च ।
द्वये कद्वयर्थांशसार्धांशै-श्चतुर्दशविभाजिते ॥३६॥
चौथा भुवनमण्डन नाम का मेरुप्रासाद तीनसौ पचहत्तर शृंगवाला है। इसके तलका
चौदह विभाग करे। उनमें से कोण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, कोणी
आधा भाग और भद्रार्ध डेढ़ भाग रखे ॥३८-३६॥
५-रत्नशीर्ष मेरुप्रासाद-
बाणैकवेदयुग्मांशा वेदाः कर्णादिभागतः ।
रत्नशीर्षो भवेन्मेरुः पञ्चशतैकभृङ्गकैः ॥४०॥
पांचवां रत्नशीर्ष मेरु प्रासाद के तलका बत्तीस भाग करे। उनमें से पांच भाग का
कोना, एक भाग की कोनी, चार भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और चार भाग का
भद्रार्ध रखे । इस प्रासाद के ऊपर पांचसौ एक शृंग है ॥४०॥
६-किरणोद्भव मेरुप्रासाद-
गुणैकयुग्मचन्द्रद्वौ पुराणांशैर्विभाजिते ।
किरणोद्भवमेरुश्च सपादषट्शताण्डकः ॥४१॥
छट्ठा किरणोद्भव मेरु प्रासाद के तल का अठारह भाग करे। उनमें से तीन भाग का
कोण, एक भाग की कोणी, दो भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और दो भाग का
भद्रार्ध रखे । इस प्रासाद के ऊपर छसौ पच्चीस शृंग है ॥४१॥
७--कमलहंस मेरुप्रासाद--
रामचन्द्रद्वियुग्मांशै-र्नेत्रैर्विंशतिभाजिते ।
नाम्ना कमलहंसः स्यात् सार्धसप्तशताण्डकः ॥४२॥
सातवां कमलहंस नामके मेरु प्रासाद के तलका बीस भाग करना चाहिये । उनमें से

षष्ठोऽध्यायः ११५
तीन भाग का कोना, एक भाग की कोनी, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नंदी और दो
भाग का भद्रार्थ रक्खे । इस प्रासाद के ऊपर सातसो पचास शृंग है ॥४२॥
८-स्वर्णकेतु मेरुप्रासाद-
भागैः कर्णादिगर्भान्तं १वेदार्थसार्धत्र्येकांशैः ।
द्वाभ्यां च स्वर्णकेतुः स्यात् पञ्चसप्ताष्टशृङ्गकैः ॥४३॥
आठवा स्वर्णकेतु नामके मेरु प्रासाद के तलका बाईस भाग करे । इनमे से चार भाग का
कोना, आधे भाग की कोणी, साढे तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नंदी और दो भाग का
भद्रार्थ बनावे । इस प्रासाद के ऊपर आठसौ पच्चहत्तर शृंग है ॥४३॥
६-वृषभध्वज मेरुप्रासाद-
वेदैकरामयुग्मांशै-र्नेत्रैर्जिनविभाजिते ।
वृषभध्वजमेरुश्च सैकाएडकसहस्रवान् ॥४४॥
नववां वृषभध्वज मेरु प्रासाद के तलका चौबीस भाग करे । इनमे से चार भाग का
कोना, एक भाग की कोनी, तीन भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्थ
रक्खे । यह प्रासाद एक हजार एक शृंग वाला है॥४४॥
सभ्रमो भ्रमहीनश्च महामेरुश्च भद्वयम् ।
सान्धारेषु प्रकर्त्तव्यं भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥४५॥
उपरोक्त नव महामेरु प्रासाद भ्रम ( परिक्रमा ) वाले अथवा विना भ्रमवाले बनाये जाते
है । एवं दो भ्रमवाले भी बनाये जाते है । यदि दो भ्रमवाले सान्धार मेरु प्रासाद बनाया जाय
तब उसके भद्र मे चंद्रावलोकन करना चाहिये अर्थात् प्रकाश के लिये जाली या गवाक्ष बनाना
चाहिये ॥४५॥
राज्ञः स्यात् प्रथमो मेरु-स्ततो हीनो २द्विजादिकः ।
विना राज्ञोऽन्यवर्णेन कृते मेरौ महद्भयम् ॥४६॥
इति नवमेरुलक्षणम् ।
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे केसर्यादि
प्रासादजातिलक्षणे पञ्चचत्वारिंशन्मेरुलक्षणे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
१. 'वेदासार्ध'त्रिसार्द्धकैः ।' २. 'ऽन्यवर्णजः ।'

११६ प्रासादमण्डने
मेरुप्रासाद राजालोग बनावें। धनिक लोग मेरुप्रासाद से न्यून प्रासाद बनावे, अर्थात्
मेरुप्रासाद नही बनावे । यदि बनावें तो राजा के साथ बनावें । राजा के बिना अकेले धनिक
द्वारा बनाया हुआ मेरुप्रासाद बड़ा भयकारक माना है ॥४६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन का केसर्यादि-
प्रासाद लक्षणनाम का छट्ठा अध्याय की सुबोधिनी नामकी
भाषाटीका समाप्त ॥६॥

अथ प्रासादमण्डने सप्तमोऽध्यायः
मंडप विधान—
रत्नगर्भाङ्कनं सूर्यचन्द्रतारावितानकम् ।
विचित्रं मण्डपं येन कृतं तस्मै नमः सदा ॥१॥
लगे हुए रत्नवाले तथा सूर्य चंद्रमा और तारे जैसा तेजस्वी वितान (गुम्बद का पेटा
भाग चांदनी) वाले, ऐसे अनेक प्रकार के मण्डपो की जिसने रचना की है, उनको हमेशा
नमस्कार है ॥१॥
गर्भाग्रमंडप—
कर्णगूढा विलोक्याश्च एकत्रिकद्वारसंयुताः ।
प्रासादाग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वदेवेषु मण्डपाः ॥२॥
गूढ़ कोना वाला अर्थात् दीवार वाला अथवा बिना दीवार वाला खुला, तथा एक
अथवा तीन द्वारवाला, ऐसा मंडप सब देवो के प्रासाद के आगे किया जाता है ॥२॥
जिनप्रासाद के मंडप—
गूढस्त्रिकस्तथा नृत्यः क्रमेण मण्डपास्त्रयः ।
जिनस्याग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वेषां तु बलाणकम् ॥३॥
जिनदेव के गर्भगृह के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकी वाले त्रिकमडप और इसके
आगे नृत्यमंडप, इस प्रकार अनुक्रम से तीन मंडप बनावे । बाकी सब देवो के गर्भगृह के आगे
बलाणक बनावे ॥३॥
मंडपके पांच मान—
समं सपादं प्रासादात् सार्धं च पादोनद्वयम् ।
द्विगुणं वा प्रकर्त्तव्यं मण्डपं पञ्चधा मतम् ॥४॥
मंडप का नाप प्रासाद के बराबर, सवाया, डेढा, पौने दुगना अथवा दुगना किया जाता
है । ये मंडप के पांच प्रकार के नाप हैं ॥४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ मे सवा दो गुणा और ढाई गुणा ये दो प्रकार का अधिक
नाप मिलाकर सात प्रकार के मंडप के नाप लिखे हैं ।

११८
प्रासादमण्डने
गर्भगृह
कौली
(अन्तराल)
गूढ मण्डप
चतुष्किका
चतुष्किका
त्रिक मण्डप
त्रिमण्डप
नव चतुष्किका
त्रिक मण्डप
चतुष्किका
नृत्य मण्डप.
रंगमण्डप
चतुष्किका
शृंगार चौकी
प्रासाद और मडपों का तलदर्शन

११६
। से दश
हाथ के
को सिर्फ
र जानना
। चाहिये ।
। अधिक
। न्यूना न
। न न्यून
प मे स्तंभ,
रहा है कि-
है। परन्तु
नही माना
सम चतुरस्र प्रासाद
(प्रासाद मण्डन अ. ७)