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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

वाराहीक्रमः १७३
आत्मालङ्करणम्
गन्धादिभिरलङ्कृत्य अर्घ्यं शोधयेत् ॥१०॥
आदिपदेन शस्त्रभूषणादिपरिग्रहः। आत्मानमिति शेषः। अर्घ्यं शोधये-
दित्यस्य अग्रिमसूत्रेण सहान्वयः॥१०॥
वस्तुतः यह सूत्र ग्यारहवें सूत्र का पूरक सूत्र है। इसमें किसी प्रक्रिया
अथवा विधि की चर्चा नहीं है। अर्घ्यशोधन के पूर्व साधक को स्वयं आकर्षक
रूप से सजा लेना चाहिये। कपड़े सुन्दर हों, गहने के रूप में गले में स्वर्णमाला,
अङ्गुलिभाग में अँगूठियाँ आदि पहन लेनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य का शोधन
होता है॥१०॥
अथ अर्घ्यशोधनमाह
आत्मनोऽग्रभागे गोमयेन विलिप्ते, हेतुमिश्रितजलेन चतुरस्रं
वर्त्तुलं षट्कोणं त्रिकोणमन्तरान्तरं विलिख्य, अर्घ्यशोधनमनुभिः
श्यामाक्रमोक्तैः आधारार्घ्यपात्राणि संशोध्य सामान्येनाभ्यर्च्य तदर्घ्यं
वषडित्युद्धृत्य, स्वाहेति संस्थाप्य हुं इत्यवकुण्ठ्य वौषट्
इत्यमृतीकृत्य फडिति संरक्ष्य, नमः पुष्पं निक्षिप्य, मूलेन निरीक्ष्य,
तत्पृषतैः पावयित्वा सपर्यावस्तुनि ॥११॥
हेतुमिश्रितेन प्रथममिश्रितेन। चतुरस्रादिमण्डलं प्रवेशरीत्या, चतुरस्रस्य
सर्वबाह्यत्वेन भूरिदर्शनात्। अनन्तरान्तरं परस्परमसंलग्नं यथा तथा मण्डलं
कुर्यात्। अत्र विशेषांशमुक्त्वा शेषधर्मानतिदिशति-अर्घ्यशोधनेनेति। सामान्येन
समस्तमूलमन्त्रेण। शेषं स्पष्टम्। तदर्घ्यं सपर्यावस्तूनीत्यन्तं स्पष्टोऽर्थः।
एतावत्पर्यन्तं विहितमर्घ्यशोधनं सामान्यविशेषार्घ्ययोः समानम्
अविशेषेणोक्तेः ॥११॥
गोमय से लिपी-पुती भूमि अत्यन्त पवित्र मानी जाती है। उसी भूमि पर
हेतु द्रव्यमिश्रित जल से चतुरस्र वर्त्तुल षट्कोण त्रिकोण मण्डल का इस प्रकार
निर्माण होना चाहिये कि, वे एक-दूसरे से बिना स्पर्श किये अन्तर-अन्तर पर
रहें। अर्घ्यशोधन के मन्त्रों से श्यामाक्रम के अनुसार शोधन करते हैं। यह ठीक