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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 320 में से

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वाराहीक्रमः १६९
वाराही उपासना के क्रम में सर्वप्रथम जिस नियम पर ध्यान देना चाहिये,
वह है कि, वाक् अर्थात् 'ऐं' बीज मन्त्र के साथ 'ग्लौं' बीज का सभी मन्त्रों
के आदि में प्रयोग करना चाहिये॥४॥
अथ भूतशुद्धिं विधत्ते
मूलादिषण्मन्त्रैर्यथामन्त्रं लिङ्गदेहं शोधयेत् ॥५॥
मूलादिषण्मन्त्रैरधस्तन एव सूत्रे वक्ष्यमाणैः, यथामन्त्रैः, मन्त्रे तथा
लिङ्गदेहं सूक्ष्मदेहं शोधयेत् ॥५॥
आगे के मन्त्र में छः मूलादि मन्त्र कहे गये हैं। उनके अनुसार सूक्ष्मदेह
का शोधन करना चाहिये। यह शास्त्र का आदेश है॥५॥
तान् षण्मन्त्रान् आह
मूलशृङ्गाटकात् सुषुम्नापथेन 'जीवशिवं परशिवे योजयामि
स्वाहा' 'यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा' 'रं सङ्कोचशरीरं दह
दह पच पच स्वाहा'। 'लं शाम्भवशरीरमुत्पादय स्वाहा'
'हंसः सोहमवतरावतर शिवपदात् जीवसुषुम्नापथेन प्रविश,
मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा' इति भूतशुद्धिं विधाय ॥६॥
स्वाहेत्यत्रैकमन्त्रसमाप्तिः। सुषुम्णामार्गेण परशिवे शिवयोजनशोषण-
दाहनाप्लावनशाम्भवशरीरोत्पत्ति-जीवस्वस्थाननयनानि क्रमेण षण्मन्त्रैः
कुर्यात्॥६॥
इस सूत्र में छः मन्त्रों के प्रयोग के साथ ही साथ भूतशुद्धि के सन्दर्भ
में जिस साधना-प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, वह उपासना को नव्य आयाम
देने वाला है। साधना का सारा सन्दर्भ इसमें है। इसे सम्पन्न कर लेने के बाद
दिव्यता की नयी भूमिका में उपासक प्रवेश कर जाता है।
१. सर्वप्रथम आसन पर विराजमान उपासक मूलाधार चक्र से सुषुम्णा
नाड़ी के मार्ग से अपने जीवशिव को परशिव में संयोजन करने की प्रक्रिया