परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
की अर्धरात्रि में ही कृष्णजन्म मनाया जाता है। अर्धरात्रि का निशीथ समय चतुर्थ
सन्ध्या का पुण्यप्रद समय भी है। उपासक उस अवस्था का एकान्त सदुपयोग
करता है। उस समय श्रीविद्यासाधक को अनिवार्यतः जगे रहना चाहिये। जगकर
उस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्देश कर रहे हैं—
शरीर की संरचना की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट करते हुए सूत्रकार
कह रहे हैं कि, मनुष्य का हृदय एक आकाश है। यह परम उत्कृष्ट आकाश
है, उस द्वादशदल कमल रूप आकाश-देश से एक स्वाभाविक शब्द ध्वनित
होता रहता है। हाथों से कान दबा लेने पर वह विचित्र शब्द सुनाई पड़ता
है। वह मध्यरात्र में बाह्य शब्दों के शान्त रहने पर कान विना बन्द किये
भी सुनाई देता है। यह श्रवण एक प्रकार का श्रवणानुभव सदृश माना जाता
है। उस अनाहत शब्द की श्रुत्यनुभूति में एक प्रकार की आनन्दमयी ऊर्जा
का उल्लास होता है। ऐसे ऊर्जस्वल आनन्द को प्रदान करने वाली यह
अनाहत ध्वनि है। इसका अनुसन्धान साधक को उस समय अवश्य करना
चाहिये॥२॥
शिवादिगुरुनमस्कारः
‘शिवादिश्रीगुरुभ्यो नमः’ इति मूर्ध्नि बध्नीयादञ्जलिम् ॥३॥
शिवादि इति स्पष्टम् ॥३॥
आदिगुरु शिव माने जाते हैं। गुरुजनों के प्रणाम करने के अवसर पर
सर्वप्रथम शिव को ही नमस्कार करना चाहिये। इसके बाद अन्य गुरुजनों का
नमस्कार विहित है। प्रणाम करते हुए शिर पर अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाने
का भी क्रम अपनाना चाहिये। इस प्रक्रिया में श्रद्धा का प्राधान्य रहना
चाहिये॥३॥
वाराहीपद्धतौ सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषस्य योगमाह
वाचमुच्चार्य ‘ग्लौं’ इति च पद्धतावस्यां सर्वे मनवो
जप्याः ॥४॥
अस्यां पद्धतौ सर्वमन्त्रादौ, ‘ऐं ग्लौं’ इति योज्यमित्यर्थः ॥४॥