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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 320 में से

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श्यामाक्रमः १६३
बायीं एड़ी के घात के साथ करास्फोट करते उत्तर ओर मुँह करके नाराच मुद्रा
से बलि अर्पित कर देना चाहिये।
इसके बाद में हाथ-मुँह धोकर माँ को प्रणाम करने के बाद अन्य कार्यों
में प्रवृत्त होना चाहिये॥३५॥
एवं बलिप्रदानक्रममुक्त्वा सुवासिनीपूजादिकमुपदिशति
श्यामलां शक्तिमाहूय बालया तामभ्यर्च्य तस्या हस्त
आदिमोपादिमौ दत्त्वा तत्त्वं शोधयित्वा तच्छेषमुररीकृत्य योग्यैः सह
हविःशेषं स्वीकुर्यात्।।३६।।
अभ्यर्च्येति विशेषानुक्तेः, यथाविभवम्। तत्त्वं शोधयित्वा इत्यनेन
तत्त्वशोधनमन्त्रा अपि प्राप्ताः। ते च मन्त्राश्चत्वारः प्रसिद्धाः। तैः पात्रचतुष्टयं
ग्राहयित्वा चतुर्थपात्रं सशेषं ग्राहयित्वा तच्छेषं स्वयम् उररीकुर्यात्।
हविश्शेषप्रतिपत्तिमाह—योग्यैरिति। योग्यपदार्थः श्रीक्रमोक्तशिष्टपदेन
व्याख्यातः। इत्थं च तस्य प्रयोजनं तदितिकर्तव्यता, तत् सर्वमपि श्रीक्रमोक्त-
प्रकारेणावगन्तव्यं भवति ।।३६।।
बलिक्रिया के अनन्तर श्यामला शक्ति का आवाहन कर बाला मन्त्र से
उसकी पूजा होनी चाहिये। पूजा के लिये सूत्रकार का स्पष्ट निर्देश है कि,
बाला से पूजा की जानी चाहिये। तत्त्वशोधन मन्त्र प्रसिद्ध है। दीक्षा प्रकरण
के सूत्र ३९ में इसकी चर्चा की गयी है। उन शक्तियों को सभी पात्र समर्पित
कर चतुर्थ पात्र का शेष अंश स्वयं ग्रहण करना चाहिये। खण्ड ५।२२ सूत्र
की व्याख्या में शिष्टशब्द की व्याख्या है। श्रीक्रम के अनुसार सारा समायोजन
उचित है ।।३६।।
एवं सङ्गीतमातृकापूजा कियत्कालं कर्त्तव्या, इत्याकाङ्क्षायां तदवधिमाह
एवं नित्यसपर्यां कुर्वन् लक्षजपं जप्त्वा तद्दशांशक्रमेण होम-
तर्पण-ब्राह्मणभोजनानि विदध्यात् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण नित्यसपर्यां नित्यपूजाम्, अत्र कुर्वन्नित्यनेन पूजनस्य
जपाङ्गत्वं गमयति। अतः जपः प्रधानं, तदवधित्वस्य पूजायां कथनात्। अत