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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 320 में से

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( ६ )
देवता के लिए स्थान बनाना होता है। जड़ता के वितान में कहीं एक चिन्मय
स्थान बनाना। पूजा का अभिप्राय ही यह है कि, चिन्मय पदार्थों से चिन्मयी
की पूजा हो। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव को चिन्मय बनाना होता है
क्योंकि शरीर का प्रत्येक अवयव तभी अर्पणीय होता है जब देवी से एकाकार
हो जाए। सपर्या शब्द दूसरा है। यह सत्कार मात्र के लिए प्रयुक्त होता है।
इसकी व्युत्पत्ति तो नहीं मिलती लेकिन मेरे अनुभव से संस्कृत में विरल धातु
है स्पृणाति। उससे स्पर् या सपर निकला हो और उससे यह शब्द बना हो,
सपर्या। अथवा इसका अर्थ भी उच्छ्वसित होना है, उच्छ्वसित करना है।
किसी भी व्यक्ति या इष्ट के सत्कार के लिए उमगना और उस व्यक्ति या इष्ट
देवता का उमंग के वातावरण में आहूत करना सपर्या है। सपर्या का एक अर्थ
तैयारी भी है, जो लोक-भाषा के सपरने अर्थ में आज भी जीवित है। तीसरा
शब्द है पूजा। यह प्रत्यक्ष या कल्पना में ध्यात द्रव्यों का इष्ट देवता के लिए
निवेदन करना है। यह सत्कार का पूरक है। अर्चना इसी अनुभाव्य रूप की
होती है। चाहे श्रीचक्र हो, मूर्ति हो। इसीलिए अर्चा का एक अर्थ विग्रह भी
होता है। इसका अर्थ किसी मूर्ति या किसी यन्त्र पर कुछ चढ़ाना भी होता
है। इतनी बात मैंने केवल सूचना देने के लिए जोड़ी है क्योंकि प्रायः इन शब्दों
के सूक्ष्म भेद की चर्चा नहीं मिलती। परशुरामकल्पसूत्र का यह संस्करण
प्रकाशित हो रहा हैं इससे मुझे बहुत परितोष है और इसलिए मैं पण्डित जी
को हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
विद्यानिवास मिश्र