परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १५७
१. द्रां बीज के द्रावणबाण का चतुर्थीरूप द्रावणबाणाय शब्द लगाकर नमः
जोड़ना चाहिये। जैसे 'द्रां द्रावणबाणाय नमः' यह इसका मूलमन्त्र होता है।
इसमें आदि में 'ऐं क्लीं सौः' और चतुर्थ्यन्त और 'नमः' बीच में 'श्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' भी लगाते हैं। यह परम्परा है। यह पूर्वकोण की
पूजा है।
२. 'ऐं क्लीं सौः द्रीं शोषणबाणाय श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' यह मन्त्र
बनता है।
३. इसी तरह क्लीं बन्धनबाणाय नमः, ४. ब्लूं मोहनबाणाय नमः और
५. सः उन्मादनबाणाय नमः से ही पूजा करने पर पाँचों कोणों पर पञ्च
बाणों की पूजा सम्पन्न होती है। इसके बाद माया (ह्रीं) काम (क्लीं) वाग्
(ऐं) (ब्लूं) (स्त्रीं) से युक्त काम, मन्मथ, कन्दर्प, मकरकेतन, मनोभव इन
पाँच नामों के साथ त्रितारीयुक्त मन्त्र बनाकर पूजा करनी चाहिये।
उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—'ऐं क्लीं सौः ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि
तर्पयामि नमः'। इसी तरह 'क्लीं' से मन्मथ, ऐं से कन्दर्प, ब्लूं से
मकरकेतन, स्त्रीं से मनोभव के मन्त्र ऊहनपूर्वक बनाकर पूजा करनी चाहिये।
यह द्वितीय आवरण की पूजा मानी जाती है॥२४॥
तृतीयावरणपूजादेशादीनाह
अष्टदलमूले ब्राह्मी-माहेश्वरी-कौमारी-वैष्णवी-वाराही-
माहेन्द्री-चामुण्डा-चण्डिकाः सेन्दुस्वरयुग्मान्त्यादयः पूज्याः। तदग्रे
लक्ष्मी-सरस्वती-रति-प्रीति-कीर्त्ति-शान्ति-पुष्टि-तुष्टयः ॥२५॥
इन्दुना अनुस्वारेण, सहिता ये स्वरयुग्मेषु अं आं, इं ईं, उं ऊं, ऋं
ॠं, लं लूं, एं ऐं, ओं औं, अं अः, इत्यष्टसु अन्त्याः आं ईं ऊं ॠं लूं
ऐं औं अः इत्यष्टौ वर्णा आदौ एभिः क्रमेण युक्ता ब्राह्म्यादयः पूज्याः।
मन्त्रस्वरूपं यथा—आं ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि इति। तदग्रे इति अष्टदलाग्रे
इत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२५॥
अष्टदल कमल के पूर्व दल के अग्रभाग से ब्राह्मी के क्रम से आठों दलों
पर आठ देवशक्तियों की पूजा की जाती है। सेन्दु का अर्थ अनुस्वारयुक्त होता