परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें(५)
इसीलिए इसके आचार में किसी मत की निन्दा, छोटे से छोटे व्यक्ति या पदार्थ
की अवहेलना विशेष रूप से वर्जित है। विशेष करके स्त्री मात्र को आदर देना
और यह सब इसी का सूचक है कि, श्रीविद्या विरोधों के उपशम का अभ्यास
है और जीवन को स्वीकार बनाने का अभ्यास है। बाह्य पूजा इसलिए आवश्यक
है कि, इसके अभ्यास से बाह्य संसार का दिव्य रूपान्तरण होता रहता है। यह
भावना करना कि, समस्त पदार्थ चिन्मय हैं। वस्तु को वस्तु मात्र नहीं रहने
देती और साधक के मन में जैसा भी संसार है, उसको स्वीकार करते हुए उसको
चिन्मय बनाने के लिए प्रेरित करती है। यह अपने आप में इस विद्या की सबसे
बड़ी विशेषता है। इसके भीतर जैसे-जैसे प्रवेश करते हैं, त्यों त्यों अपार परितोष
का अनुभव होने लगता है। इसके साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के यन्त्रों की
रचना से एक आध्यात्मिक राग-बोध होता है। यह राग-बोध अर्चन के क्रम
में अर्चन सामग्री की तैयारी में और अर्चन के अन्त में एकाग्र होकर जल में
और अन्त में इन सबके समर्पण में परिलक्षित होता है। परशुरामकल्पसूत्र
शिवशक्त्यैक्यरूपिणी भगवती ललिता महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना का आधार
ग्रन्थ है। मुझे विश्वास है कि, परशुरामकल्पसूत्र की आचार्य पं. परमहंस मिश्र
द्वारा प्रस्तुत व्याख्या विद्या-प्रेमियों के लिए बड़ी उपकारक होगी।
श्रीविद्या के उपासकों से अपेक्षा की जाती है कि, वे अपने आचरण में
सर्वात्म भाव का ही परिचय दें और भगवती की उपासना इस बुद्धि से करें
कि, इस उपासना के फल के सभी साझेदार हों। वे चाहे उपासना करते हों,
न करते हों या उसका विरोध करते हों। पर सभी प्रपंच के अंग में और सब
में उस शक्ति की व्यापकता की अनुभूति हो। इसीलिए उपासना की जाती है।
यह अपने आप में परम सुख है। अपने आप में परामुक्ति है।
अन्त में वरिवस्या, सपर्या, पूजा और अर्चना इन चार शब्दों पर थोड़ा
विचार देना आवश्यक समझता हूँ। वरिवस्या शब्द का प्रयोग तान्त्रिक साधना
में विशेष रूप से हुआ है। वेदों में वरिवस का अर्थ है खुला स्थान, अवकाश,
ऐसा स्थान जो ठीक-ठाक करके किसी के लिए तैयार किया गया हो। उससे
नामधातु बनायेंगे तो उसका अर्थ यह होगा कि, अपने इष्ट के लिए स्थान
बनाना। उनको प्रतिष्ठित करने के लिए उचित आसन् देना। तान्त्रिक पूजा की
विशेषता यही है कि वहाँ पहले पूजा सामग्री के लिए, पूजा पात्र के लिए,