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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 320 में से

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( ३ )
गुरु पूजा के साथ-साथ ही गणपति पूजा श्रीविद्या का आवश्यक अंग
है। गणपति समष्टि के देवता हैं। समष्टि के साथ जुड़ करके पूजना सम्यक्
पूजा होती है। पाँच तत्त्वों में पृथ्वी तत्त्व के अधिष्ठाता देवता गणपति होते
हैं। इसलिए भी उनकी आराधना की जाती है। उसके साधक का पार्थिव तत्त्व
से सम्बन्ध रहे। इसी पार्थिव तत्त्व को ऊपर उठाना श्रीविद्या का लक्ष्य है।
श्रीविद्या उपासना के चार सोपान हैं— श्रीक्रम, श्यामाक्रम, वाराही-क्रम और
पराक्रम। श्रीक्रम महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना है। श्यामा-क्रम मातंगी या श्यामला
की उपासना है। वाराही-क्रम महात्रिपुरसुन्दरी की दंडिनी दण्डनायक/सेनानायक/
सचिव वाराही शक्ति की उपासना है। पराक्रम अव्यक्त महाशक्ति की
उपासना है।
परशुरामकल्पसूत्र में सभी उपासनाओं का प्रतिपादन है। उसके साथ ही
साथ संक्षेप में सिद्धान्त का भी है। सिद्धान्त पक्ष बहुत स्पष्ट है। विश्व ३६
तत्त्वों वाला है। ये ३६ तत्त्व हैं— शुद्धविद्या, सदाशिव या परमशिव, सांख्य
के तत्त्व प्रकृति, अहंकार, बुद्धि, मन, पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत, दस इन्द्रिय=२४
और पुरुष को लेकर पच्चीस। इनके अतिरिक्त पंच कंचुक कला, अविद्या, राग,
काल, नियति और शिव-शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, विद्या और जीव। स्वविमर्श
ही पुरुषार्थ है। वर्णात्मक शब्द नित्य है। मन्त्रों में अचिन्त्य अपार शक्ति है।
सर्वसिद्धि सम्प्रदाय के अनुसार साधना से और विश्वास से प्राप्त होती है। विश्वास
ही प्रमाण है। गुरु मन्त्र, देवता और अपने प्राण की एकता के साधन से
आत्मज्ञान होता है। भावना की दृढ़ता से शक्ति की सिद्धि होती है।
साधना के नियमों में कुछ नियम बहुत आवश्यक हैं। किसी भी दर्शन
की निन्दा नहीं करें। किसी की भी अवहेलना न करें। रहस्य केवल अपने शिष्य
को बतलाएँ। विद्या के साथ अर्थात् अपने मन्त्र के साथ निरन्तर जुड़ाव बनाए
रखें। निरन्तर अपने भीतर शिवता है यह अनुभव करते रहें। काम, क्रोध, लोभ,
मोह, मद, मत्सर, हिंसा, स्तेय, लोक-विद्वेष से बचें। संशयरहित होकर एक
गुरु की ही उपासना करें। परिग्रह त्याग करते रहें, निष्काम कर्म करते रहें।
नित्य कर्म करें अनित्य को छोड़ दें। निर्भय रहें। समस्त सिद्धान्तों का निचोड़
देते हुए परशुरामकल्पसूत्र में कहा गया है कि, यह मानकर के आचरण करें
कि, जितने भी पदार्थ ज्ञेय हैं, वे हव्य हैं, इन्द्रियाँ स्वाहा हैं। शक्तियाँ ज्वाला