पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (४३९)
सुदुस्तरा इयं महानदी। तदहं द्रव्यमात्रं पारे धृत्वा समा-
गच्छामि। ततः त्वां एकाकिनीं स्वपृष्ठमारोप्य सुखेन उत्ता-
रयिष्यामि”। सा प्राह-“सुभग! एवं क्रियताम्” इत्युक्तवा
अशेषं वित्तं तस्मै समर्पयामास। अथ तेन अभिहितं,-“भद्रे!
परिधानाच्छादनवस्त्रमपि समर्पय, येन जलमध्ये निःशंका
व्रजसि”। तथा अनुष्ठिते धूर्त्तो वित्तं वस्त्रयुगलंञ्च आदाय
यथाचिन्तितविषयं गतः। सापि कण्ठनिवेशितहस्तयुगला
सोद्वेगा नदीपुलिनदेशे उपविष्टा यावत् तिष्ठति, तावत् एत-
स्मिन्नन्तरे काचित् शृगालिका मांसपिण्डगृहीतवदना तत्र
आजगाम। आगत्य च यावत् पश्यति, तावत् नदीतीरे
महान् मत्स्यः सलिलात् निष्क्रम्य बहिःस्थित आस्ते। एतञ्च
दृष्ट्वा सा मांसपिण्डं समुत्सृज्य तं मत्स्यं प्रति उपाद्रवत्। अत्रा-
न्तरे आकाशात् अवतीर्य्य कोऽपि गृध्रस्तं मांसपिण्डमादाय
पुनः खमुत्पपात। मत्स्योऽपि शृगालिकां दृष्ट्वा नद्यां प्रविवेश।
सा शृगालिका व्यर्थश्रमा गृध्रं अवलोकयन्ती तया नग्नि-
कया सस्मितं अभिहिता-
किसी स्थानमें हालिक स्त्री पुरुष रहते थे। वह हालिककी स्त्री पतिके वृद्ध
होनेसे सदा औरकी चिन्ता करती किसी प्रकारभी घरमें स्थिरताको प्राप्त न
होती। केवल परपुरुषको खोज कर स्थित थी। तब किसी पराया धन हरने-
वाले धूर्तने उसे देख कर एकान्तमें कहा-“सुभगे! मेरी स्त्री मरगई है। तेरे
दर्शनसे मै कामसे पीडित हुआ हू। सो मुझे रति दक्षिणा दो”। तब उसने
कहा-“भो सुभग! जो ऐसा है तो मेरे पतिके बहुत धन है वृद्ध होनेसे वह
चलनेको समर्थ नहीं है। सो उसका धन लेकर मै आती हू। जो तुम्हारे साथ
और स्थानमें जाकर रतिका सुख अनुभव करू”। उसने कहा-“यह बात
मुझेभी भली लगती है। प्रातःकाल इस स्थानमें तुम शीघ्र आना जिससे अच्छे
किसी नगरमें जाकर तुम्हारे सग जीवन सफल करू”। वहभी बहुत अच्छा
ऐसी प्रतिज्ञा कर हँसकर अपने घर जाय रात्रिमें पतिके सोजा नेपर सब धनको
लेकर कथित स्थानमें आई। धूर्तभी उसे आगे लेकर दक्षिण दिशाको आश्रय