पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextनाटकदीप का संक्षेप ८३
करने की रीति भी सुन लीजिये—देहादियों में 'मैंपन' का अभि-
मान करने वाला अहंकार 'कर्ता' (जीव) कहाता है। उसके अभि-
मान करने के साधन को मन कहते हैं। वह क्रम से कभी अन्दर
और कभी बाहर क्रियायें किया करता है। वह मन जब अन्त-
र्मुख होकर 'म' ऐसी वृत्ति करता है तब वह वृत्ति 'कर्ता' (जीव)
की ओर इशारा करती है। जब तो उसी मन में बहिर्मुख वृत्ति
होती है तब वह बाह्य पदार्थों की ओर 'यह' ऐसा संकेत किया
करती है। अब उस इदम् (यह) में जो रूपादि विशेष विशेष
धर्म होते हैं, उनका ज्ञान पांचों इन्द्रियों से होता है। इतनी बातें
समझ लेने के बाद अब जरा 'साक्षी' तत्व को भी समझ लीजिये—
जो तो केवल चिद्रूप रह कर ही उस 'कर्ता' को भी, उपर्युक्त
'क्रियाओं' को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण गन्ध आदि
'विषयों' को भी, एक ही प्रयत्न से प्रकाशित किया करता है, उसी
चिद्रूप तत्व को वेदान्तों में 'साक्षी' कहा है। लोक में भी देख
लो—नृत्यशाला में जलता हुआ दीपक, नाट्यगृह के 'प्रभु' को,
नाट्य देखने वाले 'सभ्यों' को तथा 'नर्तकी' को एक ही रूप
से प्रकाशित किया करता है। प्रकाश करते हुए किसी की खास
रियायत नहीं करता है और जब ये सब लोग नृत्यशाला को छोड़
कर चले जाते हैं तब भी वह विचारा अकेला ज्यों का त्यों जला
ही करता है। ठीक इसी दृष्टान्त की तरह यह साक्षी तत्त्व 'अहं-
कार' को 'बुद्धि' को तथा 'विषयों' को प्रकाशित किया करता है।
परन्तु जब सुषुप्ति आदि के समय अहंकार आदियों में से कोई
भी शेष नहीं रह जाता है तब भी तो यह 'साक्षी' पहले की तरह
ही जगमगाता रहता है। वह कूटस्थ तत्व तो सदा भासता ही
रहता है। मानो कोई अखण्ड दीपक ही जल रहा हो। यह