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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 672

८४ पंचदशी

बिचारी गरीब बुद्धि उसी सदाविभात साक्षी की चमक से उधारी
चमक लेकर अनेक रूप से नाचा करती है। यह बुद्धि जिस
नाटक को खेल रही है, उसके पात्र आदि को भी जान लो।
'अहंकार' ही इस नाटक का 'प्रभु' है। क्योंकि नाटक के मालिक
की तरह विषयभोग की सफलता और विफलता से हर्ष और
विषाद इसी को तो होते हैं। 'विषय' ही इस नाटक के 'सभ्य'
माने गये हैं। नाटक के दर्शकों को जैसे सुखदुःखमयी घटना
देखने पर भी सुख दुःख नहीं होते, इसी प्रकार इन विषयों को
भी सुख दुःख कुछ नहीं होते। 'बुद्धि' ही इस नाटक की 'नर्तकी'
है। क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के विकार इसी में
तो होते हैं। ताल आदि को धारण करने वाली 'इन्द्रियां' हैं।
क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनुकूल व्यापार किया
करती हैं। यह 'साक्षी' ही, इन सब का 'प्रकाशक दीपक' माना
गया है। क्योंकि इसी से इन सब का प्रकाश होता है। दीपक
जैसे एक ही जगह रक्खा हुआ अपने चारों ओर प्रकाश पहुंचा
देता है इसी प्रकार यह साक्षी भी अपने स्वरूप में स्थित रहकर
ही बाहर और अन्दर प्रकाशित कर देता है। अन्दर और बाहर
का यह विभाग भी देह की दृष्टि से ही है। साक्षी की दृष्टि में
तो ऐसा कोई भी विभाग नहीं है। वैसे तो बुद्धि अन्दर बैठी
रहती है, परन्तु वह इन्द्रियों की टोली के साथ बाहर निकल
पड़ती है। अब समझ गये होंगे कि चंचलता इस बुद्धि की ही
है। परन्तु फिर भी इस चंचलता का आरोप साक्षी तत्व में व्यर्थ
ही कर लिया जाता है। झरोखे में से जो प्रकाश घर में आ रहा
है, उसमें यदि हाथ को नचावें तो जैसे वह धूप ही नाचती सी
दीखती है, इसी प्रकार साक्षी तो अपनी जगह पर ही डटा बैठा